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Showing posts from May, 2020

सृष्टिरचयिता_कबीरपरमेश्वर ने जगन्नाथपुरी के पण्डा के पैर की जलन को शांत कर दिया था।

इस असार संसार में कोई अमर नहीं है, सिर्फ हरि नाम ही सार है।  इतना कहकर कबीर साहिब उठ खड़े हुए और बोतल को देखा तो उसमें थोड़ा सा ही जल शेष था उन्होंने उस  शेष थोड़े जल को अपने पैरों पर डालना शुरु कर दिया  जल की धार ही नहीं टूटी और उस पानी से दरबार में बिछी फर्श-कालीन गीली होने लगीं। इस कारनामे को देखकर राजा और मंत्री सभी चोक कर अपनी-अपनी जगहों पर खड़े हो गये। राजा ने कबीर साहिब के पास जाकर कहा ये आप क्या कर रहे हैं महाराज? हमारा सारा राजदरबा  भीग जाएगा। इस पर कबीर साहिब ने जल गिराना बंद करके कहा   अपने दरबार की भीगने की चिन्ता न करें राजन। हम तो जगन्नाथ पुरी के पण्डा रामहर्ष के पैरों की जलन शांत कर रहे थे। क्षणभर पहले ही तप्त जल से उसके पैर जल गए थे और वह मदद के लिए हमें पुकार रहा था।य यह सुनकर राजा और दरबारी सभी विस्मित हो गए कि कबीर साहिब काशी  राजदरबार के बीच खड़े होकर, जगन्नाथ पुरी में मौजूद पण्डा के पैरो   की जलन कैसे शांत कर सकते हैं? ऐसा नहीं हो सकता। इस पर रविदास जी ने राजा से कहा कि ऐसा ही हुआ है राजन! राम हर्ष...

बैन_TIK_TOK

सारी गलती माता और पिता की है 95% माताजी की है #आज_की_वेश्या  कहा जाता है कि प्राचीन काल में एक वैश्या का नाच देखने के लिए लोग उसके खास मकान(कोठे) पर जाया करते थे। तो वो वैश्या  देखने वालों को अपनी मनमोहक नृत्य शैली और अपने नग्नता के जरिए वाह वाही लूटती थी। अगर उस वैश्या से पूछा जाता कि वो ये काम क्यो करती है?  तो 100% में से 99.99% ये जवाब होता के मजबूरी है, में मजबूर हूं शोक में ये काम नहीं करती हूं। वो मजबूरी अगर पता लगाने की कोशिश की जाती तो हर किसी की एक अपनी दिल को दहलाने वाली कहानी होती । किसी के सर पर मां बाप का साया ना रहा, तो किसी को पति हारामी व नालायक  मिला।  ये तमाम बातें करने का मकसद ये है कि उन तवायफों की मजबूरियां समझ में आती थीं। मगर आज की वैश्या को क्या हो गया है? पता नहीं  में बात कर रहा हूं  उन कुछ  *_टिक टोक_* वाली *लड़कियों _* की। जी हां मुझ को पता है कि बहुत से लोगों को मेरी बात बहुत ही बुरी लगी रही होगी मगर ये बात करनी भी ज़रूर है तो में कहना चाहूंगा उन लोगो से (जिनको मेरी बाते बुरी लग रही हैं) के भाई जरा  अ...

इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत कौन है?

आओ सुनो एक कहानी, अभी बनी है, नहीं पुरानी,  कौन है सतगुरु हम पर बीती, हमने जानी 1. सच्चा सतगुरू आया सच्चखण्ड से सच्चा ज्ञान बताने.., सत भगती देकर के हमको, सचखंड ले जाने 2. जब खुला पिटारा सत ज्ञान का, लोग लगे दांतो तले ऊँगली दबाने, ऐसा ज्ञान कभी नहीं जाना, सबको लगे बताने. 3.तीनो देव की होवे मृत्यु, शास्त्रों से लगे दिखाने.., परमात्मा साकार है, कबीर नाम है, सबको लगे समझाने 4.सत ज्ञान समझ, जुड़ने लगे भगत, आ गए कबीर घराने.., अब ढोंगी डूबत देख अपनी नैया,लगे हाथ पावन चलाने 5. कह सतगुरु को झूठा झूठा, खुद झूठ बोले सीना ताने..,  उनमे से है नकली आर्य समाजी, जो न भेद गुरु का जाने 6. अब्डम सब्डम ज्ञान दयानन्द का उसको लगे सर पे बिठाने.., जब  खोली पोल नकलियों की तो लगे बोखलाने 7. करौंथा कांड करके माने, नशेड़ी दयानन्द के दीवाने.., सतगुरु को जेल डाल कर, लगे उदमस्ताने 8. सोचा खेल हो गया ख़तम, लगे फिर से अपनी दूकान चलाने..,  सतगुरु नहीं वो खुद भगवन आये हैं इन्हें भूल पड़ी अनजाने 9. रुक कर सत्य फिर हुआ उजागर, लगा सूर्य की तरह किरणे फैलाने.., धीरे धीरे बढ़ती संगत, सतगुरु चरन चित लगाने 10. सच...

एकादशी ‘‘व्रत करना गीता अनुसार कैसा है

         ‘‘व्रत करना गीता अनुसार कैसा है‘‘ ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी ‘निर्जला एकादशी’ कही जाती है क्योंकि अन्य एकादशियों के व्रत में तो फलाहार किया जाता है किन्तु निर्जला एकादशी के व्रत में फल तो क्या जल भी ग्रहण  नहीं करते । इसका व्रत भीषण गर्मी में अत्यन्त कष्टप्रद होता है । भोले भक्त भगवान प्राप्ति के लिए बिना अन खाए भी पूरा दिन व्यतीत करते हैं  i परमेश्वर (जिन्दा साधु के रुप में) बोले कि हे धर्मदास! आप एकादशी का व्रत करते हो। श्रीमद्भगवत् गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में मना किया है कि हे  अर्जुन! यह योग (भक्ति) न तो अधिक खाने वाले का और न ही बिल्कुल न खाने  वाले का अर्थात् यह भक्ति न ही व्रत रखने वाले, न अधिक सोने वाले की तथा  न अधिक जागने वाले की सफल होती है। इस श्लोक में व्रत रखना पूर्ण रुप से  मना है। देख अपनी गीता खोलकर, धर्मदास जी को गीता के श्लोक याद भी थे।  क्योंकि प्रतिदिन पाठ किया करता था। फिर भी सोचा कि कहीं जिन्दा सन्त( कबीर) नाराज न हो जाए, इसलिए गीता खोलकर अध्याय 6 श्लोक 16 पढ़ा तथा स्वीकारा ...