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Showing posts from December, 2018

नकली गुरु को त्याग देना पाप नही /

              नकली गुरु को त्याग देना पाप nhi यह सारी सच्चाइ  समझ कर वह पुण्य आत्मा काफी परभावित हुआ तथा कहा कि आपके द्वारा (संत रामपाल जी महाराज द्वारा ) बताया गया ज्ञान सही  है और हमारी साधना ठीक नही  है। वह लगातार तीन बार सतसंग सुनने आया तथा कहा कि दिल तो कहता है कि मैं भी नाम ले लू लेकिन मेरे सामने एक दीवार खड़ी है। 1 एक तो कहते हैं गुरु नहीं बदलना चाहिए, पाप होता है। 2 दूसरे मै ने लगभग 400.500 (चार सौ-पांच सौ) भक्तों को इसी पंथ के संत से उपदेश दिलवा रखा है वे मुझे अपना सरदार तथा पूर्ण ज्ञान युक्त समझते है । अब मुझे श२म लगती है वे क्या कहेंगे ? अर्थात् मुझे धिक्कारेंगे।  मैंने (संत रामपाल दास ने) उस भक्त आत्मा को बताया :-- कबीर साहिब व सर्व संत यही कहते है  कि झूठे गुरु को तुरन्त त्याग दे।  प्रमाण के लिए कबीर पंथी शब्दावली पृष्ट न.. 263 से सहाभार -- झूठे गुरु के पक्ष को, तजत न कीजै बार। राह न पावै शब्द का, भटकै द्वारहिं द्वार।। जैसे एक वैद्य (डॉक्टर) से इलाज नही हो तो दूसरा वैद्य (डॉक्टर) ढूंढना चाहि...

नकली नामों से मुक्ति नहीं

एक सुशिक्षित सभ्य व्यक्ति मेरे पास आया। वह उच्च अधिकारी भी था तथा किसी अमुक पंथ व संत से नाम भी ले रखा था व प्रचार भी करता था वह मेरे (संत रामपाल दास) से धार्मिक चर्चा करने लगा। उसने बताया कि ‘‘मैंने अमुक संत से नाम ले रखा है, बहुत साधना करता हूँ। उसने कहा मुझे पाँच नामों का मन्त्रा (उपदेश) प्राप्त है जो काल से मुक्त कर देगा।‘‘ मैंने (रामपाल दास ने) प ूछा कौन-2 से नाम हैं। वह भक्त बोला यह नाम किसी को नहीं बताने होते। उस समय मेरे पास बहुत से हमारे कबीर साहिब के यथार्थ ज्ञान प्राप्त भक्त जन भी बैठे थे जो पहले नाना पंथो से नाम उपदेशी थे। परंतु सच्चाइ र् का पता लगने पर उस पंथ को त्याग कर इस दास (रामपाल दास) से नाम लेकर अपने भाग्य की सराहना कर रहे  कि ठीक समय पर काल के जाल से निकल आए। पूरे परमात्मा (पूर्ण ब्रह्म) को पाने का सही माग र् मिल गया। नही ं तो अपनी गलत साधना वश काल के मुख मे ं चले जाते।  उन्हीं भक्तो ं मे ं से एक न े कहा कि मैं भी पहल े उसी पंथ से नाम उपद ेशी (नामदानी) था। यही पाँच नाम मैंने भी ले रखे थे परंतु वे पाँचा ें नाम काल साधना के हैं, सतपुरुष प्रा...

महान परिवर्तन का शंखनाद बरवाला की घटना

महान परिवर्तन का शंखनाद बरवाला की घटना विचार बदलेंगे तो क्रियाओं में परिवर्तन होगा अब देश की आजादी का लाभ केवल 5़ या10 % 15 प्रतिशत जनता को हुआ है। विशेषकर 5 प्रतिशत को ही अधिक लाभ है। देश की आबादी के 5 प्रतिशत व्यक्ति भ्रष्ट राजनेता, भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी व कर्मचारी तथा अन्य विभागों के भ्रष्ट अधिकारी व कर्मचारी तथा मिलावट करने वाले व फैक्ट्री के मालिक तथा भ्रष्ट जज हैं। भारत देश की आजादी सन् 1947 से लेकर वर्तमान (2015) तक भारत के प्रधानमन्त्रा ईमानदार रहे हैं। केवल प्रधानमन्त्रा की ईमानदारी पर्याप्त नहीं है। उदाहरण के लिए आदरणीय श्री मनमोहन सिंह पूर्व प्रधानमन्त्रा जी स्वयं तो ईमानदार थे, परंतु अन्य मन्त्रागणों ने जो उत्पात किया, वह प्रत्यक्ष है। एक मन्त्री  जी पर आरोप लगा कि 1लाख75000़ हजार करोड (एक लाख पिछत्तर हजार करोड़)़ रूपये का घोटाला किया है। मन्त्रा जी को जेल भी जाना पड़ा। फिर जमानत हो गई। केन्द्र तथा राज्य सरकारों में एैसे-एैसे कई हजार घोटाले हैं जो प्रकाश में नहीं आ सके हैं। देश की गरीबी का कारण यही है क्योंकि गरीब जनता से कर (ज्ंग) लिया जात...

पाकिस्तान से आए धर्मगुरु ने ली संत रामपाल जी महाराज की शरण

h https://youtu.be/RC-bI3v3uO8 दी गई लिंक पर क्लिक करें वीडियो देखने के लिए

‘‘वेदों में सृष्टी रचना का प्रमाण’’

काण्ड नं. 4 अनुवाक नं. 1 मंत्रा नं. 1 :- ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्त्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः।।1।। संधिछेद :- ब्रह्म जज्ञानम् प्रथमम् पुरस्त्तात् विसिमतः सुरुचः वेनः आवः सः बुध्न्याः उपमा अस्य विष्ठाः सतः च योनिम् असतः च वि वः। (1) अनुवाद :- (प्रथमम्) प्राचीन अर्थात् सनातन (ब्रह्म) परमात्मा ने (जज्ञानम्) प्रकट होकर अपनी सूझ-बूझ से (पुरस्त्तात्) सर्व प्रथम समय में शिखर में अर्थात् सतलोक आदि को (सुरुचः) स्वइच्छा से बड़े चाव से स्वप्रकाशित (विसिमतः) सीमा रहित अर्थात् विशाल सीमा वाले भिन्न लोकों को उस (वेनः) रचनहार ने ताने अर्थात् कपड़े की तरह बुनकर (आवः) सुरक्षित किया (च) तथा (सः) वह पूर्ण ब्रह्म ही सर्व रचना करता है इसलिए उसी मूल मालिक ने मूल स्थान सतलोक की रचना की है इसलिए उसी (बुध्न्याः) मूल मालिक ने (योनिम्) मूलस्थान सत्यलोक को रच कर (अस्य) इस सतलोक के (उपमा) उपमा के सदृश अर्थात् मिलते जुलते (सतः) अक्षर पुरुष अर्थात् परब्रह्म के लोक कुछ स्थाई (च) तथा (असतः) क्षर पुरुष के अस्थाई अर्थात् नाशवान लोक आदि (वि वः) आवास स...

‘‘पुस्तक से मिला अद्धभुत परिणाम

हम सन्त रामपाल जी महाराज के शिष्यों ने अन्यायी जजों व अत्याचारी मुख्यमन्त्रा हरियाणा के जुल्मों से तंग आकर 27.9.2010 को पुस्तक ‘‘सच बनाम झूठ’’ हरियाणा के सभी सत्रा एवं जिला न्यायालयों पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय चण्डीगढ़, दिल्ली के विभिन्न न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय में जनहित के लिए वितरित की। इ-मेल तथा स्पीड पोस्ट के द्वारा केन्द्रीय मण्त्रामण्डल को इस पुस्तक ‘‘सच बनाम झूठ’’(अन्याय तथा अत्याचार) को भेजा। इस पुस्तक में हरियाणा के मुख्यमन्त्रा व देश की विभिन्न अदालतों में बेठे कुछ अन्यायी जजों द्वारा संविधान की धाराओं को ताक पर रख कर निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए जो अन्याय व अत्याचार किया गया है उसका वर्णन किया गया है। जिसका तुरंत परिणाम यह आया कि केन्द्रिय मन्त्रा मण्डल ने 5.10.2010 को अपने अति व्यवस्थित सैड्यूल से समय निकालकर अचानक मिटिंग की जिसमें जजों की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाले विधेयक पर केबिनेट ने मोहर लगा दी। जिसमें कहा गया है कि एक पांच सदस्यिय समिती गठित की गई है। भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध होने पर जज को (चाहे सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट तथा निचली अदालत क...

‘‘मक्का महादेव का मंदिर है‘‘ प्रमाणित 👍👊

                      ‘‘मक्का महादेव का मंदिर है‘‘ भाई बाले वाली जन्म साखी में प्रमाण है :- ‘‘साखी मदीने की चली‘‘ हिन्दी वाली के पृष्ठ 262 पर श्री नानक जी ने चार इमामों के प्रश्न का जवाब देते हुए कहा है :- आखे नानक शाह सच्च, सुण हो चार इमाम। मक्का है महादेव का, ब्राह्मण सन सुलतान।। अब आप जी को अपने उद्देश्य की ओर ले चलता हूँ। आप जी को स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जो यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान सूक्ष्म वेद, गीता तथा चारों वेदों में है, वह न तो पुराणों में है, न कुआर्न् शरीफ में, न बाईबल में, न छः शास्त्रों तथा न ग्यारह उपनिषदों में। उदाहरण :- जैसे दसवीं कक्षा तक का पाठ्यक्रम गलत नहीं है, परंतु उसमें ठण्।ण् तथा डण्। वाला ज्ञान नहीं है। वह पाठ्यक्रम गलत नहीं है, परन्तु पर्याप्त नहीं है। समझने के लिए इतना ही पर्याप्त है। अन्य उदाहरण :- गीता अध्याय 2 श्लोक 46 में कहा है कि अर्जुन! बड़े जलाशय (झील) की प्राप्ति के पश्चात् छोटे जलाशय (तालाब, जोहड़) में जितनी आस्था रह जाती है, उसी प्रकार पूर्ण परमात्मा का सम्पूर्ण ज्ञान होने...

‘‘श्राद्ध-पिण्डदान गीता अनुसार कैसा है?‘‘ आप श्राद्ध व पिण्डदान करते हो। ।

‘‘श्राद्ध-पिण्डदान गीता अनुसार कैसा है?‘‘ आप श्राद्ध व पिण्डदान करते हो। गीता अध्याय 9 श्लोक 25 में स्पष्ट किया है कि भूत पूजने वाले भूतों को प्राप्त होंगे। श्राद्ध करना, पिण्डदान करना यह भूत पूजा है, यह व्यर्थ साधना है। कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, क्षर पुरुष वाकि डार। तीनों देवा शाखा हैं, पात रुप संसार।। भावार्थ :- जमीन से बाहर जो वृक्ष का हिस्सा है, उसे तना कहते हैं। तना तो जानों अक्षर पुरुष, तने से कई मोटी डार निकलती हैं। उनमें से एक मोटी डार जानों क्षर पुरुष। उस डार से तीन शाखा निकलती हैं, उनको जानों तीनों देवता (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव-शंकर जी) और इन शाखाओं को पत्ते लगते हैं, उन पत्तों को संसार जानो। गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में सांकेतिक विवरण है। तत्वज्ञान में विस्तार से कहा गया है। पहले गीता ज्ञान के आधार से ही जानते हैं। गीता अध्याय 15 श्लोक 2 में कहते हैं कि संसार रुपी वृक्ष की तीनों गुण (रजगुण ब्रह्माजी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शंकर जी) रुपी शाखाएं है। ये ऊपर (स्वर्ग लोक में) तथा नीचे (पाताल लोक) फैली हुई हैं। नोट :- रजगुण ब्रह...

‘‘व्रत करना गीता अनुसार कैसा है‘‘

परमेश्वर (जिन्दा साधु के रुप में) बोले कि हे धर्मदास! आप एकादशी का व्रत करते हो। श्रीमद्भगवत् गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में मना किया है कि हे अर्जुन! यह योग (भक्ति) न तो अधिक खाने वाले का और न ही बिल्कुल न खाने वाले का अर्थात् यह भक्ति न ही व्रत रखने वाले, न अधिक सोने वाले की तथा न अधिक जागने वाले की सफल होती है। इस श्लोक में व्रत रखना पूर्ण रुप से मना है। देख अपनी गीता खोलकर, धर्मदास जी को गीता के श्लोक याद भी थे क्योंकि प्रतिदिन पाठ किया करता था। फिर भी सोचा कि कहीं जिन्दा सन्त नाराज न हो जाए, इसलिए गीता खोलकर अध्याय 6 श्लोक 16 पढ़ा तथा स्वीकारा कि आपने मेरी आँखें खोल दी जिन्दा। आप तो परमात्मा के स्वरुप लगते हो।

‘‘पवित्र श्रीमद्भगवत गीता में सृष्टी रचना का प्रमाण‘‘ 😳

                              Sat gayan                     (दुर्गा तथा ब्रह्म की मैथुन क्रिया से ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव की उत्पत्ति) इसी का प्रमाण पवित्रा गीता जी अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 तक है। ब्रह्म (काल) कह रहा है कि प्रकृति (दुर्गा) तो मेरी पत्नी है, मैं ब्रह्म(काल) इसका पति हूँ। हम दोनों के संयोग से सर्व प्राणियों सहित तीनों गुणों (रजगुण - ब्रह्मा जी, सतगुण - विष्णु जी, तमगुण - शिवजी) की उत्पत्ति हुई है। मैं (ब्रह्म) सर्व प्राणियों का पिता हूँ तथा प्रकृति (दुर्गा) इनकी माता है। मैं इसके उदर में बीज स्थापना करता हूँ जिससे सर्व प्राणियों की उत्पत्ति होती है। यही प्रमाण अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 16, 17 में भी है। गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 1 ऊर्ध्वमूलम्, अधःशाखम्, अश्वत्थम्, प्राहुः, अव्ययम्, छन्दांसि, यस्य, पर्णानि, यः, तम्, वेद, सः, वेदवित्।।1।। अनुवाद : (ऊर्ध्वमूलम्) ऊपर को पूर्ण परमात्मा आदि पुरुष परमेश्वर रूपी जड़ वाला (अधःशाखम्) नीचे ...

दूसरों की घटिया साधना की दिखावटी चकाचौंध को देख कर अपनी सही साधना को नहीं त्यागना चाहिए

 गीता श्लोक 47 में कहा है कि दूसरों की सुव्यवस्थित दिखाई देने वाली तड़क-भड़क शास्त्रा विरूद्ध गुणरहित साधना से अपनी शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म (साधना) उत्तम है। उसे करते (उन शुभ भक्ति कर्मों को करते) हुए पाप को प्राप्त नहीं होते। ।। न त्यागे जाने वाले कर्म।। श्लोक 48 में अच्छे कर्म जैसे यज्ञ-दान-सुमरण चाहे दोष युक्त हैं (क्यांकि हवन यज्ञ में सूक्ष्म जीव जलते हैं, दान में जब प्रसाद बनता है अग्नि में जीव हिंसा होती है। दान के लिए आटा मुख्य होता है। कनक (गेहूँ, बाजरा, ज्वार, धान की उत्पत्ति में जीव हिंसा होती है।) फिर भी यह कर्म नहीं त्यागने चाहिऐं, क्यांकि जैसे अग्नि में धुआँ होता है। ऐसे सर्व कर्म दोष युक्त हैं। (जैसे अच्छे कर्म सूखी लकड़ी व गैस समझो तथा बुरे कर्म गीली लकड़ी जिसमें धुआँ अधिक है वह समझो) श्लोक 49 में विकारों पर विजय प्राप्त पूर्ण रूप से बुरे कर्मों से तथा (सस्त्रयासेन) विकारों से हटे हुए चित वाला (असक्त बुद्धिः) विषयों की होड से दूर (विगतस्पृह) सर्व पाप कर्मों को नष्ट होने के पश्चात् जो पूर्ण मुक्ति अर्थात् सिद्धि होती है उस अनादि मोक्ष को प्राप्त करके सदा ...

भक्त का स्वभाव कैसा हो? | जीने की राह

अनुराग सागर पृष्ठ 6 पर लिखी पंक्ति नं. 7 से 17 तक का भावार्थ है कि धनी धर्मदास जी ने परमेश्वर कबीर जी से विनयपूर्वक प्रश्न किया कि हे प्रभु! मुझे मृतक का स्वभाव समझाओ कैसा होता है? किस प्रकार जीवित मरना होता है। हे अमर परमात्मा! हे स्वामी! कृप्या बिलोय अर्थात् निष्कर्ष निकालकर वह अमृत धन अर्थात् अमर होने का मार्ग बताऐं। परमेश्वर कबीर वचन = मृतक के दृष्टान्त परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि हे धर्मदास! यह जो प्रश्न आपने किया है, यह जटिल कथा प्रसंग है। सतगुरू शरण में रहकर ज्ञान का इच्छुक ही इसको समझकर खरा उतरता है। भृंगी का दृष्टांत संत-साधकजन जीवित मृतक होकर परमात्मा को खोजते हैं। शब्द विचार यानि यथार्थ नाम मंत्रों को समझ विचार करके उस मार्ग के अंत यानि अंतिम छोर तक पहुँचते हैं अर्थात् पूर्ण मोक्ष प्राप्त करते हैं।  www.jagatgururampalji.org  click 👈👈🙏

27. माता-पिता की सेवा व आदर करना परम कर्तव्य | जीने की राह

गत गुरु रामपाल जी Toggle navigation »  जीने की राह  »  27. माता-पिता की सेवा व आदर करना परम कर्तव्य | जीने की राह 27. माता-पिता की सेवा व आदर करना परम कर्तव्य | जीने की राह प्रत्येक माता-पिता की तमन्ना होती है कि मेरी संतान योग्य बने। समाज में बदनामी न ले। अच्छे चरित्रा वाली हो, आज्ञाकारी हो। वृद्धावस्था में हमारी सेवा करे। हमारी बहु हमारे कहने में चलने वाली आए। समाज में हमारी इज्जत रखे। वृद्धावस्था में हमारी सेवा करे। प्यार से व्यवहार करे। सत्ययुग, त्रोता, द्वापर तक यह मर्यादा चरम पर रही। सब सुखी जीवन जीते थे। कलयुग में कुछ समय तक तो ठीक रहा, परंतु वर्तमान में स्थिति विपरीत ही है। इसे सुधारने का उद्देश्य लेखक (रामपाल दास) रखता है। आशा भी करता हूँ कि भगवान की कृपा से ज्ञान के प्रकाश से सब संभव हो जाता है, हो भी रहा है और होगा, यह मेरी आत्मा मानती है।  www.jagatgururampalji.org  

विवाह में प्रचलित वर्तमान परंपरा का त्याग:- Hona chaya

विवाह में व्यर्थ का खर्चा त्यागना पड़ेगा। जैसे बेटी के विवाह में बड़ी बारात का आना, दहेज देना, यह व्यर्थ परंपरा है। जिस कारण से बेटी परिवार पर भार मानी जाने लगी है और उसको गर्भ में ही मारने का सिलसिला शुरू है जो माता-पिता के लिए महापाप का कारण बनता है। बेटी देवी का स्वरूप है। हमारी कुपरम्पराओं ने बेटी को दुश्मन बना दिया। श्री देवीपुराण के तीसरे स्कंद में प्रमाण है कि इस ब्रह्माण्ड के प्रारम्भ में तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) का जब इनकी माता श्री दुर्गा जी ने विवाह किया, उस समय न कोई बाराती था, न कोई भाती था। न कोई भोजन-भण्डारा किया गया था। न डी.जे बजा था, न कोई नृत्य किया गया था। श्री दुर्गा जी ने अपने बड़े पुत्रा श्री ब्रह्मा जी से कहा कि हे ब्रह्मा! यह सावित्राी नाम की लड़की तुझे तेरी पत्नी रूप में दी जाती है। इसे ले जाओ और अपना घर बसाओ। इसी प्रकार अपने बीच वाले पुत्र श्री विष्णु जी से लक्ष्मी जी तथा छोटे बेटे श्री शिव जी को पार्वती जी को देकर कहा कि ये तुम्हारी पत्नियां हैं। इनको ले जाओ औ...

विवाह कैसे करें | जीने की राह

जगत गुरु रामपाल जी Toggle navigation »  जीने की राह  »  8. विवाह कैसे करें | जीने की राह 8. विवाह कैसे करें | जीने की राह जैसे श्री देवी दुर्गा जी ने अपने तीनों पुत्रों (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) का विवाह किया था, इसी पुस्तक में आगे पढ़ेंगे। मेरे (लेखक के) अनुयाई ऐसे ही करते हैं। 17 मिनट की असुर निकंदन रमैणी है। फेरों के स्थान पर उसको बोला जाता है जो करोड़ गायत्राी मंत्रा (¬ भूर्भवः ...) से उत्तम तथा लाभदायक है। जिसमें विश्व के सर्व देवी-देव तथा पूर्ण परमात्मा का आह्वान तथा स्तुति-प्रार्थना है। जिस कारण से सर्व शक्तियां उस विवाह वाले जोड़े की सदा रक्षा तथा सहायता करते हैं। इससे बेटी बची रहेगी। जीने की सुगम राह हो जाएगी।

. गुरू बिन मोक्ष नही | जीने की राह

    प्रश्न:- क्या गुरू के बिना भक्ति नहीं कर सकते? उत्तर:- भक्ति कर सकते हैं, परन्तु व्यर्थ प्रयत्न रहेगा। प्रश्न:- कारण बताऐं? उत्तर:- परमात्मा का विधान है जो सूक्ष्मवेद में कहा है:- कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान। गुरू बिन दोंनो निष्फल है, पूछो वेद पुराण।। कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरू कीन्ह। तीन लोक के वे धनी, गुरू आगे आधीन।। कबीर, राम कृष्ण बड़े तिन्हूं पुर राजा। तिन गुरू बन्द कीन्ह निज काजा।। भावार्थ: - गुरू धारण किए बिना यदि नाम जाप की माला फिराते हंै और दान देते हैं, वे दोनों व्यर्थ हैं। यदि आप जी को संदेह हो तो अपने वेदों तथा पुराणों में प्रमाण देखें। श्रीमद् भगवत गीता चारों वेदों का सारांश है। गीता अध्याय 2 श्लोक 7 में अर्जुन ने कहा कि हे श्री कृष्ण! मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। गीता अध्याय 4 श्लोक 3 में श्री कृष्ण जी में प्रवेश करके काल ब्रह्म ने अर्जुन से कहा कि तू मेरा भक्त है। पुराणों में प्रमाण है कि श्री रामचन्द्र जी ने ऋषि वशिष्ठ जी से नाम दीक्षा ली थी और अपने घर व राज-काज में ग...

श्रीमद भगवद गीता गहरी नज़र गीता में - संत रामपाल जी महाराज

          #असली_गीता_सार               😊 पूर्ण परमात्मा (पूर्ण ब्रह्म) अर्थात् सतपुरुष का ज्ञान न होने के कारण सर्व विद्वानों को ब्रह्म(निरंजन- काल भगवान जिसे महाविष्णु कहते हैं) तक का ज्ञान है। पवित्र आत्माऐं चाहे वे ईसाई हैं, मुसलमान, हिन्दू या सिख हैं इनको केवल अव्यक्त अर्थात् एक ओंकार परमात्मा की पूजा का ही ज्ञान पवित्र शास्त्रों (जैसे पुराणों, उपनिष्दांे, कतेबों, वेदों, गीता आदि नामों से जाना जाता है) से हो पाया। क्योंकि इन सर्व शास्त्रों में ज्योति स्वरूपी(प्रकाशमय) परमात्मा ब्रह्म की ही पूजा विधि का वर्णन है तथा जानकारी पूर्ण ब्रह्म(सतपुरुष) की भी है। पूर्ण संत (तत्वदर्शी संत) न मिलने से पूर्ण ब्रह्म की पूजा का ज्ञान नहीं हुआ। जिस कारण से पवित्र आत्माऐं ईसाई फोर्मलैस गौड (निराकार प्रभु) कहते हैं। जबकि पवित्र बाईबल में उत्पत्ति विषय के सृष्टि की उत्पत्ति नामक अध्याय में लिखा है कि प्रभु ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया तथा छः दिन में सृष्टि रचना करके सातवें दिन विश्राम किया। इससे स्वसिद्ध है कि प्रभ...

‘‘विवाह कैसे करें’’ तथा ‘‘विवाह के पश्चात् की यात्रा’’

                                   पुस्तक ‘‘जीने की राह’’ में बताया गया है कि वर्तमान में बच्चों को अच्छे विचार नहीं मिल रहे। जो बुजुर्ग व्यक्ति युवाओं तथा बच्चों को किसी बहाने अपने पास बैठाते थे। दो-तीन बुजुर्ग आपस में चर्चा करते थे कि भाई! एक घटना उस गाँव में बुरी घटी है। दूसरा पूछता कि ऐसा क्या हो गया? यूँ सुना है कि गाँव के एक जवान लड़के ने एक लड़की के साथ छेड़छाड़ कर दी। लड़की वालों ने लड़के के साथ मारपीट कर दी। बिना कारण को जाने लड़के वालों ने लड़की वालों से झगड़ा कर दिया। लड़के वालों के दो व्यक्ति मर गए, लड़की वालों का एक मर गया। दोनों पक्षों के कई-कई व्यक्ति घायल हो गए। तीसरा बुजुर्ग कहता था कि हे भाई! कैसा कुपूत पैदा हो गया। तीन मानष खा गया। ऐसे पुत्रा से बेऔलाद रह ले। कैसा खोटा जमाना आ गया। लड़के ने जुल्म कर दिया। अपने गाँव की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर रखा था। ऐसा कर्म कोई बालक ना करे। उनके पास बैठे सुन रहे बच्चों पर उनकी बातों की छाप ऐसी पड़ती थी कि युवा बच्चे अन्य ...

•••【काल की पारिभाषा 】,,

                     पवित्रा विष्णु पुराण (प्रथम अंश) अध्याय 2 श्लोक 15 में वर्णन है कि भगवान विष्णु (महाविष्णु रूप में काल) का प्रथम रूप तो पुरुष (प्रभु जैसा) है परन्तु उसका परम रूप ‘काल‘ है। जब भगवान विष्णु (काल जो महाविष्णु रूप में ब्रह्मलोक में रहता है तथा प्रकृति अर्थात् दुर्गा को अपनी पत्नी महालक्ष्मी रूप में रखता है) अपनी प्रकृति (दुर्गा) से अलग हो जाता है तो काल रूप में प्रकट हो जाता है। (यह प्रकरण विष्णु पुराण प्रथम अंश अध्याय 2 पृष्ठ 4-5 गीता प्रैस गोरख पुर से प्रकाशित है। अनुवादक हैं श्री मुनिलाल गुप्त।) विशेष :- उपरोक्त विवरण का भावार्थ है कि यह महाविष्णु अर्थात् काल पुरुष प्रथम दृष्टा रूप तो लगता है कि यह दयावान भगवान है। जैसे खाने के लिए अन्न, मेवा व फल आदि कितने स्वादिष्ट प्रदान किए हैं तथा पीने के लिए दूध, जल कितने स्वादिष्ट तथा प्राण दायक प्रदान किए हैं। कितनी अच्छी वायु जीने के लिए चला रखी है, कितनी विस्तृत पृथ्वी रहने तथा घूमने के लिए प्रदान की है, फिर पति-पत्नी का योग, पुत्रां व पुत्रियों की प्राप्त...