गीता श्लोक 47 में कहा है कि दूसरों की सुव्यवस्थित दिखाई देने वाली तड़क-भड़क शास्त्रा विरूद्ध
गुणरहित साधना से अपनी शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म (साधना) उत्तम है। उसे करते (उन शुभ भक्ति
कर्मों को करते) हुए पाप को प्राप्त नहीं होते।
।। न त्यागे जाने वाले कर्म।।
श्लोक 48 में अच्छे कर्म जैसे यज्ञ-दान-सुमरण चाहे दोष युक्त हैं (क्यांकि हवन यज्ञ में सूक्ष्म
जीव जलते हैं, दान में जब प्रसाद बनता है अग्नि में जीव हिंसा होती है। दान के लिए आटा मुख्य
होता है। कनक (गेहूँ, बाजरा, ज्वार, धान की उत्पत्ति में जीव हिंसा होती है।) फिर भी यह कर्म
नहीं त्यागने चाहिऐं, क्यांकि जैसे अग्नि में धुआँ होता है। ऐसे सर्व कर्म दोष युक्त हैं। (जैसे अच्छे
कर्म सूखी लकड़ी व गैस समझो तथा बुरे कर्म गीली लकड़ी जिसमें धुआँ अधिक है वह समझो)
श्लोक 49 में विकारों पर विजय प्राप्त पूर्ण रूप से बुरे कर्मों से तथा (सस्त्रयासेन) विकारों से हटे हुए
चित वाला (असक्त बुद्धिः) विषयों की होड से दूर (विगतस्पृह) सर्व पाप कर्मों को नष्ट होने के
पश्चात् जो पूर्ण मुक्ति अर्थात् सिद्धि होती है उस अनादि मोक्ष को प्राप्त करके सदा सुखी हो जाता
है।
गुणरहित साधना से अपनी शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म (साधना) उत्तम है। उसे करते (उन शुभ भक्ति
कर्मों को करते) हुए पाप को प्राप्त नहीं होते।
।। न त्यागे जाने वाले कर्म।।
श्लोक 48 में अच्छे कर्म जैसे यज्ञ-दान-सुमरण चाहे दोष युक्त हैं (क्यांकि हवन यज्ञ में सूक्ष्म
जीव जलते हैं, दान में जब प्रसाद बनता है अग्नि में जीव हिंसा होती है। दान के लिए आटा मुख्य
होता है। कनक (गेहूँ, बाजरा, ज्वार, धान की उत्पत्ति में जीव हिंसा होती है।) फिर भी यह कर्म
नहीं त्यागने चाहिऐं, क्यांकि जैसे अग्नि में धुआँ होता है। ऐसे सर्व कर्म दोष युक्त हैं। (जैसे अच्छे
कर्म सूखी लकड़ी व गैस समझो तथा बुरे कर्म गीली लकड़ी जिसमें धुआँ अधिक है वह समझो)
श्लोक 49 में विकारों पर विजय प्राप्त पूर्ण रूप से बुरे कर्मों से तथा (सस्त्रयासेन) विकारों से हटे हुए
चित वाला (असक्त बुद्धिः) विषयों की होड से दूर (विगतस्पृह) सर्व पाप कर्मों को नष्ट होने के
पश्चात् जो पूर्ण मुक्ति अर्थात् सिद्धि होती है उस अनादि मोक्ष को प्राप्त करके सदा सुखी हो जाता
है।
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