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Showing posts from 2020

कबीर सतगुरु हम सूं रीझ कर, एक कहा प्रसंग। बरस्या बादल प्रेम का, भीज गया सब अंग।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और हिटलर की ऐसी कौन सी घटना है जिसको कोई नहीं जानता?

एक बार नेताजी हिटलर को पहली बार मिलने जर्मनी गये, तो हिटलर के आदमियों ने उन्हें बाहर प्रतीक्षा हॉल में बैठा दिया। नेताजी उसी दौरान बैठे बैठे किताब पढ़ने लगे। थोड़ी देर बाद एक आदमी आया हिटलर का हम शक्ल बनकर और नेताजी के साथ बात कर के चला गया। नेता जी ने कोई भाव व्यक्त नहीं किया, थोड़ी देर के बाद दूसरा आदमी हिटलर के वेश में आकर नेताजी से हिटलर बन कर बात की।नेता जी ने उसको भी कोई भाव नहीं दिया । इस तरह एक के बाद एक कई बार हिटलर के वेश धारण कर के उनके हमशक्ल आ के खुद को हिटलर बता कर बात करते रहे लेकिन नेताजी फिर भी बैठे बैठे किताब पढते रहे हिटलर को मिलने के लिए ( जबकि आम तौर पर दूसरे लोग हिटलर के हमशक्ल को मिलते ही, खुद हिटलर को मिलके आये हैं ऐसे भ्रम में वापस लौट आते थे).... आखिर में खुद हिटलर आया और आते ही हिटलर ने नेताजी के कंधे पर हाथ रखा.... नेताजी तुरंत बोल उठे.... हिटलर... हिटलर भी आश्चर्य में पड़ गया इतने सारे मेरे हमशक्ल आये फिर भी आप मुझे कैसे पहचान गये... जब की हमारी पहले कभी कोई मुलाकात नहीं हुई। नेताजी ने तब जवाब दिया कि जिसकी आवाज़ से ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमंत्री...

मुसीबत का सामना

जंगली भैंसों का एक झुण्ड जंगल में घूम रहा था, तभी एक बछड़े (पाड़ा) ने पुछा," पिताजी, क्या इस जंगल में ऐसी कोई चीज है जिससे डरने की ज़रुरत है ?" बस शेरों से सावधान रहना ...", भैंसा बोला "हाँ, मैंने भी सुना है कि शेर बड़े खतरनाक होते हैं . अगर कभी मुझे शेर दिखा तो मैं जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हुआ भाग जाऊँगा ..", बछड़ा बोला . "नहीं, इससे बुरा तो तुम कुछ कर ही नहीं सकते ..", भैंसा बोला बछड़े को ये बात कुछ अजीब लगी, वह बोला" क्यों ? वे खतरनाक होते हैं, मुझे मार सकते हैं तो भला मैं भाग कर अपनी जान क्यों ना बताऊं?" भैंसा समझाने लगा," अगर तुम भागोगे तो शेर तुम्हारा पीछा करेंगे, भागते समय वे तुम्हारी पीठ पर आसानी से हमला कर सकते हैं और तुम्हे नीचे गिरा सकते हैं ... और एक बार तुम गिर गए तो मौत पक्की समझो ..." तो.. तो। ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए ?", बछड़े ने घबराहट में पुछा . अगर तुम कभी भी शेर को देखो , तो अपनी जगह डट कर खड़े हो जाओ और ये दिखाओ की तुम जरा भी डरे हुए नहीं हो . अगर वो ना जाएं तो उसे अपनी तेज सींघें दिखाओ ...

संत रज्जब मुसलमान थे, पठान थे।

संत रज्जब मुसलमान थे, पठान थे।  किसी युवती के प्रेम में थे। विवाह का दिन आ गया। बारात सजी। बारात चली। रज्जब घोड़े पर सवार। मौर बाँधा हुआ सिर पर। बाराती साथ है, बैंड बाजा है इत्र का छिड़काव है, फूलों की मालाएँ है। और बीच बाजार में अपनी ससुराल के करीब पहुंचने को ही थे। दस पाँच कदम शेष रह गये थे। प्रेयसी से मिलने जा रहे था। प्रेम तो तैयार था, जरा सा रूख बदलने भर की बात थी। यह मौका ठीक मौका है। लोहा जब गर्म हो तब चोट करनी चाहिए। एक तरह से देखो तो यह मौका एक दम ठीक था। कि अचानक घोड़े के पास एक आदमी आया उसका पहनाव बड़ा अजीब था। कोई फक्कड़ दिखाई दे रहा था। बारात के सामने आ कर खड़ा हो गया। और उसने गौर से रज्जब को देखा। आँख से आँख मिली। वे चार आंखें संयुक्त हो गयी। उस क्षण में क्रांति घटी। वह आदमी रज्जब के होने वाला गुरु थे—दादू दयाल जी। और जो कहा दादू दयाल जी ने वे शब्द बड़े अद्भुत है। उन छोटे से शब्दों में सारी क्रांति छिपी है। दादू दयाल ने भर आँख रज्जब की तरफ देखा, आँख मिली ओर दादू जी ने कहा— "रज्जब तैं गज्जब किया, सिर पर बांधा मौर। आया था हरी भजन कुं, करे नरक की ठौर" बस इतनी सी बा...

राजा की कथा

_एक बार समय निकालकर अवश्य पढ़े..._        ☂️बोध कथा☂️      ⭕   परिवर्तन  ⭕ ~~~~~~~~~~~~~ ♦ एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था । बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया । उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया । ♦ राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें । सारी रात नृत्य चलता रहा । ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी । नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा -  बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।_ एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय।"_ ♦ अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला । तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा।  ♦ जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो  उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं ।  ♦ वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़...

कविर्देव किसी भी मां से जन्म नहीं लेते हैं। कबीर साहेब स्वयं प्रकट होता है। इसलिए प्रकट दिवस के रूप में मनाया जाता है

सतगुरु कबीर साहिब का मगहर प्रस्थान एवम् महानिर्वाण सतगुरु कबीर साहिब दृढ़ निश्चयी संत थे, खास कर अंध विश्वासों के मामले में तो वे बहुत ही सख्त थे। इसीलिए सभी के मना करने के बाद भी, वे मगहर जाने के लिए तैयार हो गये। संत रविदास जी, सेनजी, पीपा जी, एवं धन्ना जी आदि भी सभी थे। यात्रा में काशी के हजारों लोगों की भीड़, इस तरह से आकर शामिल हो रही थी, जैसे उनका कोई खास रखवाला काशी को हमेशा के लिए त्याग कर जा रहा है। आज वे असहाय प्रतीत हो रहे थे, क्योंकि अब उनके सुख-दुख को पूछने वाला कोई नहीं रहेगा। सभी की आँखें आँसुओं से पूर्ण थीं और हृदय व्यथित था। कबीर साहिब के यात्रा की अगुवाई नवाब बि जली खाँ और काशी नरेश वीर देव सिंह बघेल कर रहे थे। राजा वीर देव सिंह बघेल के साथ उनके सैन्यदल का विशेष दस्ता था। उस समय उमड़ा जनसैलाब को दे खकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी प्रजापालक महाराजा की विदाई की जा रही हो। चारों तरपफ गुरूदेव कबीर, सतगुरु कबीर और हमारे भगवान कबीर की आवाजें गूँ ज रही थीं। छोटे-छोटे बालकों को गोद में उठाये हुये औरतें अपने-अपने बालकों को उतार कर, कबीर साहि ब के पद चिन्हों पर अपना माथ...

ऋषि कपिल और सगड़ राजा के 60 हजार पुत्र

🌲ऋषि कपिल और सगड़ राजा के 60 हजार पुत्र 🌲                kएक कपिल नाम के ऋषि थे जिनको भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक अवतार भी माना जाता है, वे तपस्या कर रहे थे। एक सगड़ राजा था। उसके 60 हजार पुत्र थे। किसी ऋषि ने बताया कि यदि एक तालाब, एक कुआँ, एक बगीचा बना दिया जाए तो एक अश्वमेघ यज्ञ जितना फल मिलता है। राजा सगड़ के लड़कों ने यह कार्य शुरू कर दिया। समझदार व्यक्तियों ने उनसे कहा कि आप ऐसे जगह-जगह तालाब, कुएँ, बगीचे बनाओगे तो पृथ्वी पर अन्न उत्पन्न करने के लिए स्थान ही नहीं रहेगा। किसी राजा ने विरोध किया तो उससे लड़ाई कर ली। उन राजा सगड़ के लड़कों ने एक घोड़ा अपने साथ लिया। उसके गले में पत्रा लिखकर बाँध दिया कि यदि कोई हमारे कार्य में बाधा करेगा, वह इस घोड़े को पकड़ ले और युद्ध के लिए तैयार हो जाए। उन सिरफिरों से कौन टक्कर ले? पृथ्वी देवी भगवान विष्णु जी के पास गई। एक गाय का रूप धारण करके कहा कि हे भगवान! पृथ्वी पर एक सगड़ राजा है। उसके 60 हजार पुत्रा हैं। उनको ऐसी सिरड़ उठी है कि मेरे को खोद डाला। वहाँ मनुष्यों के खाने के लिए अन्न भी उत्पन्न नहीं हो सक...

सृष्टिरचयिता_कबीरपरमेश्वर ने जगन्नाथपुरी के पण्डा के पैर की जलन को शांत कर दिया था।

इस असार संसार में कोई अमर नहीं है, सिर्फ हरि नाम ही सार है।  इतना कहकर कबीर साहिब उठ खड़े हुए और बोतल को देखा तो उसमें थोड़ा सा ही जल शेष था उन्होंने उस  शेष थोड़े जल को अपने पैरों पर डालना शुरु कर दिया  जल की धार ही नहीं टूटी और उस पानी से दरबार में बिछी फर्श-कालीन गीली होने लगीं। इस कारनामे को देखकर राजा और मंत्री सभी चोक कर अपनी-अपनी जगहों पर खड़े हो गये। राजा ने कबीर साहिब के पास जाकर कहा ये आप क्या कर रहे हैं महाराज? हमारा सारा राजदरबा  भीग जाएगा। इस पर कबीर साहिब ने जल गिराना बंद करके कहा   अपने दरबार की भीगने की चिन्ता न करें राजन। हम तो जगन्नाथ पुरी के पण्डा रामहर्ष के पैरों की जलन शांत कर रहे थे। क्षणभर पहले ही तप्त जल से उसके पैर जल गए थे और वह मदद के लिए हमें पुकार रहा था।य यह सुनकर राजा और दरबारी सभी विस्मित हो गए कि कबीर साहिब काशी  राजदरबार के बीच खड़े होकर, जगन्नाथ पुरी में मौजूद पण्डा के पैरो   की जलन कैसे शांत कर सकते हैं? ऐसा नहीं हो सकता। इस पर रविदास जी ने राजा से कहा कि ऐसा ही हुआ है राजन! राम हर्ष...

बैन_TIK_TOK

सारी गलती माता और पिता की है 95% माताजी की है #आज_की_वेश्या  कहा जाता है कि प्राचीन काल में एक वैश्या का नाच देखने के लिए लोग उसके खास मकान(कोठे) पर जाया करते थे। तो वो वैश्या  देखने वालों को अपनी मनमोहक नृत्य शैली और अपने नग्नता के जरिए वाह वाही लूटती थी। अगर उस वैश्या से पूछा जाता कि वो ये काम क्यो करती है?  तो 100% में से 99.99% ये जवाब होता के मजबूरी है, में मजबूर हूं शोक में ये काम नहीं करती हूं। वो मजबूरी अगर पता लगाने की कोशिश की जाती तो हर किसी की एक अपनी दिल को दहलाने वाली कहानी होती । किसी के सर पर मां बाप का साया ना रहा, तो किसी को पति हारामी व नालायक  मिला।  ये तमाम बातें करने का मकसद ये है कि उन तवायफों की मजबूरियां समझ में आती थीं। मगर आज की वैश्या को क्या हो गया है? पता नहीं  में बात कर रहा हूं  उन कुछ  *_टिक टोक_* वाली *लड़कियों _* की। जी हां मुझ को पता है कि बहुत से लोगों को मेरी बात बहुत ही बुरी लगी रही होगी मगर ये बात करनी भी ज़रूर है तो में कहना चाहूंगा उन लोगो से (जिनको मेरी बाते बुरी लग रही हैं) के भाई जरा  अ...

इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत कौन है?

आओ सुनो एक कहानी, अभी बनी है, नहीं पुरानी,  कौन है सतगुरु हम पर बीती, हमने जानी 1. सच्चा सतगुरू आया सच्चखण्ड से सच्चा ज्ञान बताने.., सत भगती देकर के हमको, सचखंड ले जाने 2. जब खुला पिटारा सत ज्ञान का, लोग लगे दांतो तले ऊँगली दबाने, ऐसा ज्ञान कभी नहीं जाना, सबको लगे बताने. 3.तीनो देव की होवे मृत्यु, शास्त्रों से लगे दिखाने.., परमात्मा साकार है, कबीर नाम है, सबको लगे समझाने 4.सत ज्ञान समझ, जुड़ने लगे भगत, आ गए कबीर घराने.., अब ढोंगी डूबत देख अपनी नैया,लगे हाथ पावन चलाने 5. कह सतगुरु को झूठा झूठा, खुद झूठ बोले सीना ताने..,  उनमे से है नकली आर्य समाजी, जो न भेद गुरु का जाने 6. अब्डम सब्डम ज्ञान दयानन्द का उसको लगे सर पे बिठाने.., जब  खोली पोल नकलियों की तो लगे बोखलाने 7. करौंथा कांड करके माने, नशेड़ी दयानन्द के दीवाने.., सतगुरु को जेल डाल कर, लगे उदमस्ताने 8. सोचा खेल हो गया ख़तम, लगे फिर से अपनी दूकान चलाने..,  सतगुरु नहीं वो खुद भगवन आये हैं इन्हें भूल पड़ी अनजाने 9. रुक कर सत्य फिर हुआ उजागर, लगा सूर्य की तरह किरणे फैलाने.., धीरे धीरे बढ़ती संगत, सतगुरु चरन चित लगाने 10. सच...

एकादशी ‘‘व्रत करना गीता अनुसार कैसा है

         ‘‘व्रत करना गीता अनुसार कैसा है‘‘ ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी ‘निर्जला एकादशी’ कही जाती है क्योंकि अन्य एकादशियों के व्रत में तो फलाहार किया जाता है किन्तु निर्जला एकादशी के व्रत में फल तो क्या जल भी ग्रहण  नहीं करते । इसका व्रत भीषण गर्मी में अत्यन्त कष्टप्रद होता है । भोले भक्त भगवान प्राप्ति के लिए बिना अन खाए भी पूरा दिन व्यतीत करते हैं  i परमेश्वर (जिन्दा साधु के रुप में) बोले कि हे धर्मदास! आप एकादशी का व्रत करते हो। श्रीमद्भगवत् गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में मना किया है कि हे  अर्जुन! यह योग (भक्ति) न तो अधिक खाने वाले का और न ही बिल्कुल न खाने  वाले का अर्थात् यह भक्ति न ही व्रत रखने वाले, न अधिक सोने वाले की तथा  न अधिक जागने वाले की सफल होती है। इस श्लोक में व्रत रखना पूर्ण रुप से  मना है। देख अपनी गीता खोलकर, धर्मदास जी को गीता के श्लोक याद भी थे।  क्योंकि प्रतिदिन पाठ किया करता था। फिर भी सोचा कि कहीं जिन्दा सन्त( कबीर) नाराज न हो जाए, इसलिए गीता खोलकर अध्याय 6 श्लोक 16 पढ़ा तथा स्वीकारा ...

”पुरी में श्री जगन्नाथ जी का मन्दिर अर्थात् धाम कैसे बना“

उड़ीसा प्रांत में एक इन्द्रदमन नाम का राजा था। वह भगवान श्री कृष्ण जी  का  अनन्य भक्त था। एक रात्रा को श्री कृष्ण जी ने राजा को स्वपन में दर्शन देकर कहा कि जगन्नाथ नाम से मेरा एक मन्दिर बनवा दे। श्री कृष्ण जी ने यह भी कहा था कि इस मन्दिर में मूर्ति पूजा नहीं करनी है। केवल एक संत छोड़ना है जो दर्शकों को पवित्रा गीता अनुसार ज्ञान प्रचार करे। समुद्र तट पर वह स्थान भी दिखाया जहाँ मन्दिर बनाना था। सुबह उठकर राजा इन्द्रदमन ने अपनी पत्नी को बताया कि आज रात्रा को भगवान श्री कृष्ण जी दिखाई दिए। मन्दिर बनवाने के लिए कहा है। रानी ने कहा शुभ कार्य में देरी क्या? सर्व सम्पत्ति उन्हीं की दी हुई है। उन्हीं को समर्पित करने में क्या सोचना है? राजा ने उस स्थान पर मन्दिर बनवा दिया जो श्री कृष्ण जी ने स्वपन में समुद्र के किनारे पर दिखाया था। मन्दिर बनने के बाद समुद्री तुफान उठा, मन्दिर को तोड़ दिया। निशान भी नहीं बचा कि यहाँ मन्दिर था। ऐसे राजा ने पाँच बार मन्दिर बनवाया। पाँचों बार समुद्र ने तोड़ दिया। राजा ने निराश होकर मन्दिर न बनवाने का निर्णय ले लिया। यह सोचा कि ...
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महामारी कोरोना

👇👇👇महामारी👇👇👇 एक बार एक राजा के राज्य में महामारी फैल गयी। चारो ओर लोग मरने लगे। राजा ने इसे रोकने के लिये बहुत सारे उपाय करवाये मगर कुछ असर न हुआ और लोग मरते रहे। दुखी राजा ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। तभी अचानक आकाशवाणी हुई। आसमान से आवाज़ आयी कि हे राजा तुम्हारी राजधानी के बीचो-बीच जो पुराना सूखा कुंआ है अगर अमावस्या की रात को राज्य के प्रत्येक घर से एक – एक बाल्टी दूध उस कुएं में डाला जाये तो अगली ही सुबह ये महामारी समाप्त हो जायेगी और लोगों का मरना बन्द हो जायेगा। राजा ने तुरन्त ही पूरे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि महामारी से बचने के लिए अमावस्या की रात को हर घर से कुएं में एक-एक बाल्टी दूध डाला जाना अनिवार्य है!  अमावस्या की रात जब लोगों को कुएं में दूध डालना था उसी रात राज्य में रहने वाली एक चालाक एवं कंजूस बुढ़िया ने सोंचा कि सारे लोग तो कुंए में दूध डालेंगे अगर मै अकेली एक बाल्टी "पानी" डाल दूं तो किसी को क्या पता चलेगा। इसी विचार से उस कंजूस बुढ़िया ने रात में चुपचाप एक बाल्टी पानी कुंए में डाल दिया। अगले दिन जब सुबह हुई तो लोग वैसे ही मर रहे थे। कुछ भी ...

‘‘दास की परिभाषा

                      ‘‘दास की परिभाषा                  ``दास की परिभाषा,, एक समय सुल्तान एक संत के आश्रम में गया। वहाँ कुछ दिन संत जी के विशेषआ आग्रहसे रूका । संत का नाम हुकम दास था। बारह शिष्य उनके साथ आश्रम में रहते थे। सबके नाम के पीछे दास लगा था। फकीर दास, आनन्द दास, कर्म दास, धर्मदास। उनका व्यवहार दास वाला नहीं था। उनके गुरू एक को सेवा के लिए कहते तो वह कहता कि धर्मदास की बारी है, उसको कहो, धर्मदास कहता कि आनन्द दास का नम्बर है। उनका व्यवहार देखकर सुल्तानी ने कहा किः- दासा भाव नेड़ै नहीं, नाम धराया दास। पानी के पीए बिन, कैसे मिट है प्यास।। सुल्तानी ने उन शिष्यों को समझाया कि मैं जब राजा था, तब एक दास मोल लाया था। मैंने उससे पूछा कि तू क्या खाना पसंद करता है। दास ने उत्तर दिया कि दास को जो खाना मालिक देता है, वही उसकी पसंद होती है। आपकी क्या इच्छा होती है? आप क्या कार्य करना पसंद करते हो? जिस कार्य की मालिक आज्ञा देता है, वही मेरी पसंद है। आप क्या पहनते हो? मालिक के ...

तब्लीग का मतलब है

                    तब्लीग का मतलब है  अल्लाह और कुरान, हदीस की बात दूसरों तक पहुंचाना. वहीं जमात का मतलब समूह से है. तबलीगी जमात यानी एक समूह की जमात. तबलीगी मरकज का मतलब इस्लाम की बात दूसरे लोगों तक पहुंचाने का केंद्र हैं. अल-कांधलवी इसे सभी दाव (अभियोग) के माध्यम से समाप्त करना चाहता था। उन्होंने अपने स्वयंसेवकों को "अल्लाह का संदेश" फैलाने के लिए गांवों में भेजा। ब्रिटिश भारत में संगठन तेजी से बढ़ा। नवंबर 1941 में आयोजित इसके वार्षिक सम्मेलन में, लगभग 25,000 लोगों ने भाग लिया। विभाजन के बाद, यह पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान (हाल ही में बांग्लादेश) में मजबूत हुआ। अब, तब्लीगी की सबसे बड़ी राष्ट्रीय शाखा बांग्लादेश में है। समूह की 150 देशों और लाखों अनुयायियों में उपस्थिति है। तबलीगी जमात का मतलब है आस्था का प्रचार करने वालों की एक टोली या समूह। 2. यह सुन्नी देवबंदी या वहाबी मुसलमानों की जमात है. 3. इसे मेवात के रहने वाले देव

मुसलमान खतना क्यों करवाते हैं

मुसलमान मूंछ क्यों कटवाते हैं सिर पर चोटी क्यों नहीं रखते खतना क्यों होती है इन अनसुलझे प्रश्नों को के उत्तर आज बताता हूं हजरत मुहम्मद (मुसलमान धर्म का प्रवर्तक) एक स्त्री के साथ अवैध संबंध बनाकर पाप के भागी बन गए थे। उनकी पत्नी बड़े घराने से थी जो बहुत पैसे वाली धनवान थी। उसकी उस क्षेत्र में बहुत चलती थी। धन के प्रभाव से लोग उसकी आज्ञा का पालन करते थे। नौकर भी रखती थी। जब हजरत मुहम्मद दूर क्षेत्र में प्रचार करने जाने लगा तो उसकी पत्नी खदीजा ने कहा था कि किसी अन्य स्त्री के चक्कर न पड़ना। यदि ये गलती की तो तेरे को सजा दी जाएगी। मुहम्मद ने शर्त स्वीकार कर ली। दूर स्थान पर मुसलमान धर्म का प्रचार करते समय आदि माया की प्रेरित सुंदर स्त्री जो विधवा थी, मुहम्मद के सम्पर्क में आई, मुसलमान बन गई। दोनों का अवैध संबंध भी हो गया खदीजा को उसके नौकरों ने बताया तो खदीजा ने मुहम्मद को बुलाकर सजा दिलाई। मुहम्मद का लिंग, आगे से मूंछे तथा सिर की चोटी कटवाने का आदेश नौकरों को दिया। नौकरों ने मूँछे तथा चोटी काट दी, परंतु लिंग नहीं काटा। लिंग की कुछ खाल (चमड़ी) जो आगे के भाग पर होती है, वह काट दी और खद...

क्या 29 अप्रैल को होने जा रहा है धरती का अन्त

  क्या वाकई दुनिया बचाने के लिए हमारे पास सिर्फ एक महीने का ही वक्त बचा है? दरअसल, दुनिया पर महाविनाश की घंटी बजने लगी है. जो दुनिया के लिए इस वक्त सबसे बड़ी चिंता बन गई है? NASA ने खुद इस बात की पुष्टि की है कि आने वाले 29 अप्रैल को दुनिया बदल सकती है. लेकिन हमें एक शोध से पता लगा है कि दुनिया में मुक्तिदाता है जो वर्तमान समय में भारत के हरियाणा प्रांत में हिसार जिले के मैं हैं जो नास्त्रेदमस ने भविष्यवाणी की है कि वह प्राकृतिक आपदा को भी टाल सकता है क्या है नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी  भविष्यवाणी आइए जानते  नास्त्रोदमस जी ने निःसंदेह कहा है कि प्रकट होने वाला शायरन (CHYREN) अभी ज्ञात नहीं है लेकिन वह क्रिश्चन अथवा मुस्लमान हरगिज नहीं है। वह हिन्दू ही होगा और मैं नास्त्रोदमस उसका अभी छाती ठोक कर गर्व करता हूं श्री नास्त्रोदमस जी की उस भविष्यवाणी से पूर्ण मेल खाता है जो पृष्ठ संख्या 44.45 पर लिखी है। ”जिस समय उस तत्वदृष्टा शायरन का आध्यात्मिक जन्म होगा उस दिन अंधेरी अमावस्या होगी । http://bit.ly/NamDiksha   लिंक पर क्लिक करके संत जी से नाम उपदेश ले इस पृथ्वी क...

क्या गुरू बदल सकते हैं?

क्या गुरू बदल सकते हैं? और इसी के ऊपर विस्तार से पूरा ब्लॉक है प्रश्न (धर्मदास जी का) :- हे प्रभु क्या गुरु बदल सकते हैं? सुना है सन्तों से कि गुरु नहीं बदलना चाहिए । गुरु एक, ज्ञान अनेक। उत्तर (सत्यपुरुष का) :- जब तक गुरु मिले नहीं साचा, तब तक गुरु करो दस पाँचा। कबीर झूठे गुरु के पक्ष को, तजत न लागै वार। द्वार न पावै मोक्ष का, रह वार का वार।। भावार्थ : जब तक सच्चा गुरु (सतगुरु) न मिले, तब तक गुरु बदलते रहना चाहिए। चाहे कितने ही गुरु क्यों न बनाने पड़ें और बदलने पड़ें। झूठे गुरु को तुरन्त त्याग देना। कबीर, डूबै थे पर उभरे, गुरु के ज्ञान चमक। बेड़ा देखा जरजरा, उतर चले फड़क।। भावार्थ : जिस समय मुझे सत्य गुरु मिले, उनके ज्ञान के प्रकाश से पता चला कि हमारा ज्ञान और समाधान (साधना) गलत है तो ऐसे गुरु बदल दिया जैसे किसी डर से पशु फड़क कर बहुत तेज दौड़ता है और जैसे रात्रि में सफर कर रहे यात्रियों को सुबह प्रकाश में पता चले कि जिस नौका में हम सवार हैं, उसमें पानी प्रवेश कर रहा है और साथ में सुरक्षित और साबत नौका खड़ी है तो समझदार यात्रा जिसने कोई नशा न कर रखा हो, वह तु...