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Showing posts from April, 2019

पहली बार ऐसा हुआ जो एक संत परमार्थ के लिए जेल धाम मे है

😵-हिसार_धाम - 😵         जेल :- शब्द अगर किसी मनुष्य के #चरित्र से जुड़ जाता है तो उसकी गरिमा पर सवाल उठने लगते है, और बदनामी का दाग लग ही जाता है! किसी व्यक्ति के जेल जाने के बाद उसे घृणा या #संदेह कि निगाह से देखा जाना लाजमी है! जेल जाने के भी विविध कारण हो सकते है और कभी-कभी उद्देश्य भी | व्यक्ति दुराचारी, भ्रष्टाचारी, दुष्कर्मी, चोर, हत्यारा, होकर भी “जेल” जाता है, और ऐसे व्यक्ति से घृणा करना या उसकी बेगुनाही पर संदेह करना स्वाभाविक है | लेकिन जरुरी नही की जेल जाने वाला हर व्यक्ति कुकर्मी हो, कुछ लोग #परमार्थ और समाज सुधार के उद्देश्य को पुरा करने के लिए भी “जेल” जैसी प्रताड़नाये स्वीकार करते है | जहाँ एक तरफ चंद्र शेखर आजाद, भगत सिंह, जैसे देश-प्रेमी हंसते-हंसते फांसी चढ़ गये तो वही दुसरी तरफ महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रपिता भी जेल भोगकर परमार्थ मे “जेल”जाने की मिशाल कायम कर गये| श्री कृष्ण! जी का तो जन्म ही जेल मे हुआ था, फिर भी इंसान आज उन्हे धिक्कारने की बजाय पूजता है | ईसा मसीह ने “सत्य” कहा तो इसी जनता ने उन्हे शूली पर टांग दिया, और वर्तमान मे उन्ह...

गीता का ज्ञान

गीता अध्याय 8 श्लोक 1 में अर्जुन ने प्रश्न किया कि हे भगवान! (किम् तत् ब्रह्म) वह ब्रह्म क्या है? जिसको जानकर साधक केवल मोक्ष ही चाहता है। इसका उत्तर गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में गीता ज्ञान दाता ने दिया है। कहा है कि “वह परम अक्षर ब्रह्म है।” गीता ज्ञान दाता ने इस परम अक्षर ब्रह्म की जानकारी गीता अध्याय 8 में ही श्लोक नं. 8ए 9ए 10ए 20ए 21ए 22ए में भी दी है जो गीता ज्ञान दाता से अन्य है। गीता अध्याय 2 श्लोक 17 में कहा है कि जिस परमेश्वर ने सम्पूर्ण जगत् की रचना की है, जिससे यह जगत व्याप्त है (अर्थात् जिसकी शक्ति से सर्व ब्रह्माण्ड टिके हैं, रूके हैं) वह वास्तव में अविनाशी परमात्मा है जिसका नाश करने में कोई समर्थ नहीं है। गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में भी कहा है कि पुरूषोत्तम तो अन्य है (गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में दो पुरूष कहे हैं, क्षर पुरूष तथा अक्षर पुरूष। उत्तम पुरूष इन से अन्य है, अर्थात् श्रेष्ठ परमेश्वर) जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सब का धारण-पोषण करता है। वह परमात्मा कहा जाता है। वही वास्तव में अविनाशी परमेश्वर है। (गीता अध्याय 15 श्लोक 17), फिर गीता अध्याय 2 के ह...

आदरणीय श्री नानक साहेब जी प्रभु कबीर (धाणक) जुलाहा के साक्षी

कबीर साहिब ने गुरु नानक देव जी को सतनाम दिया तथा सत लोक (सचखंड) दिखाया। साहेब कबीर द्वारा श्री नानक जी को तत्वज्ञान समझाना नानक जी का संक्षिप्त परिचय श्री नानक देव का जन्म विक्रमी संवत् 1526 (सन् 1469) कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को हिन्दु परिवार में श्री कालु राम मेहत्ता (खत्री) के घर माता श्रीमति तृप्ता देवी की पवित्र कोख (गर्भ) से पश्चिमी पाकिस्त्तान के जिला लाहौर के तलवंडी नामक गाँव में हुआ। इन्होंने फारसी, पंजाबी, संस्कृत भाषा पढ़ी हुई थी। श्रीमद् भगवत गीता जी को श्री बृजलाल पांडे से पढ़ा करते थे। श्री नानक देव जी के श्री चन्द तथा लखमी चन्द दो लड़के थे। श्री नानक जी अपनी बहन नानकी की सुसराल शहर सुल्तान पुर में अपने बहनोई श्री जयराम जी की कृपा से सुल्तान पुर के नवाब के यहाँ मोदी खाने की नौकरी किया करते थे। प्रभु में असीम प्रेम था क्योंकि यह पुण्यात्मा युगों-युगों से पवित्र भक्ति ब्रह्म भगवान(काल) की करते हुए आ रहे थे। सत्ययुग में यही नानक जी राजा अम्ब्रीष थे तथा ब्रह्म भक्ति विष्णु जी को इष्ट मानकर किया करते थे। दुर्वासा जैसे महान तपस्वी ऋषि भी इनके दरबार में हार मान कर क...