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गीता का ज्ञान



गीता अध्याय 8 श्लोक 1 में अर्जुन ने प्रश्न किया कि हे भगवान! (किम् तत्
ब्रह्म) वह ब्रह्म क्या है? जिसको जानकर साधक केवल मोक्ष ही चाहता है। इसका
उत्तर गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में गीता ज्ञान दाता ने दिया है। कहा है कि “वह
परम अक्षर ब्रह्म है।” गीता ज्ञान दाता ने इस परम अक्षर ब्रह्म की जानकारी गीता
अध्याय 8 में ही श्लोक नं. 8ए 9ए 10ए 20ए 21ए 22ए में भी दी है जो गीता ज्ञान दाता
से अन्य है। गीता अध्याय 2 श्लोक 17 में कहा है कि जिस परमेश्वर ने सम्पूर्ण
जगत् की रचना की है, जिससे यह जगत व्याप्त है (अर्थात् जिसकी शक्ति से सर्व
ब्रह्माण्ड टिके हैं, रूके हैं) वह वास्तव में अविनाशी परमात्मा है जिसका नाश
करने में कोई समर्थ नहीं है। गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में भी कहा है कि
पुरूषोत्तम तो अन्य है (गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में दो पुरूष कहे हैं, क्षर पुरूष
तथा अक्षर पुरूष। उत्तम पुरूष इन से अन्य है, अर्थात् श्रेष्ठ परमेश्वर) जो तीनों
लोकों में प्रवेश करके सब का धारण-पोषण करता है। वह परमात्मा कहा जाता
है। वही वास्तव में अविनाशी परमेश्वर है। (गीता अध्याय 15 श्लोक 17), फिर
गीता अध्याय 2 के ही श्लोक 59 में भी गीता ज्ञान दाता ने अपने से अन्य परमात्मा के विषय में कहा है। प्रसंग गीता अध्याय 2 श्लोक 53 से चला है।
जिसमें कहा है कि ‘हे अर्जुन‘ जिस समय भांति-भांति के भ्रमित करने वाले ज्ञान
के वचनों से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अटल तथा स्थिर ठहर
जाएगी, तब तू योग को प्राप्त होगा (गीता अध्याय 2 श्लोक 53), फिर गीता
अध्याय 2 श्लोक 59 में कहा है कि कुछ व्यक्ति निराहार रहकर (भोजन
त्यागकर) केवल फलाहार या दूग्धाहार ही करते हैं उनके कुछ समय के लिए
विषय-विकार तो निवृत हो जाते हैं, परन्तु संसार के पदार्थों से आसक्ति निवृत
नहीं होती। शास्त्रानुसार साधना करने से उस अन्य परमात्मा का साक्षात्कार
होता है, जिससे विषय-विकार तथा आसक्ति भी निवृत हो जाती है। गीता अध्याय
2 श्लोक 59 के मूल पाठ में “परम्” शब्द जिस का अर्थ है “पर” अर्थात् दूसरा
होता है। उदाहरण के लिए गीता अध्याय 7 श्लोक 13 में मूल पाठ में यही “परम्”
शब्द है। इसमें गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि तीनों गुणों (रजगुण श्री ब्रह्मा जी,
सतगुण श्री विष्णु जी तथा तमगुण श्री शंकर जी) के भाव से सारा संसार मोहित
हो रहा है, इनसे परे मुझे नहीं जानता। (गीता अध्याय 7 श्लोक 13) इसमें परम्
= पर = परे अर्थात् दूसरा अर्थ हुआ। इसी प्रकार गीता अध्याय 2 श्लोक 59 में
“परम” का अर्थ पर = परे अर्थात् दूसरा जानें क्योंकि गीता अध्याय 11 श्लोक
55 तथा गीता अध्याय 12 श्लोक 1 से 6 में प्रमाण है। गीता अध्याय 11 श्लोक
55 में संकेत किया है कि मत् कर्मकृत् = शास्त्रानुकुल भक्ति कर्म मेरे लिए (मत्
परम्) मेरे से श्रेष्ठ परमात्मा के लिए करता हुआ (मत् भक्त) मेरा भक्त मुझे ही
प्राप्त होता है। क्योंकि जब तक तत्वदर्शी सन्त नहीं मिलता, तब तक वेदों
अनुसार ज्ञान से ’’ऊँ’’ नाम का जाप पूर्ण परमात्मा का मानकर करते हैं। जिससे
ब्रह्म लोक में चले जाते हैं। इसलिए कहा है कि मेरा भक्त मेरे से अन्य पूर्ण
परमात्मा की भक्ति करके भी मुझे ही प्राप्त होता है (गीता अध्याय 11 श्लोक 55)
फिर गीता अध्याय 12 श्लोक 1 में स्पष्ट है कि अर्जुन ने प्रश्न किया कि जो
भक्त पूर्वोक्त प्रकार से (गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में संकेत है) जो (त्वम्)
आपको तथा जो (अव्यक्तम् अक्षरम्) अविनाशी अव्यक्त (“जिस का वर्णन गीता
अध्याय 8 श्लोक 20 से 22 में है”) उसको भजते हैं, उनमें से उत्तम भक्ति वाला
कौन-सा भक्त है?( गीता अध्याय 12 श्लोक 1)
फिर गीता अध्याय 12 श्लोक 2 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि मेरा भक्त
जो केवल मेरे ध्यान में लगा है, वह (युक्ततमाः मताः) मेरे विचार से वह सही
साधक है। (गीता अध्याय 12 श्लोक 2)
गीता अध्याय 12 श्लोक 3 से 4 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि “जो उस
सर्वव्यापी जिसके विषय में मैं भी नहीं जानता, जो सदा एक रस रहने वाला
स्थाई, अचल, अव्यक्त अर्थात् परोक्ष अविनाशी परम अक्षर ब्रह्म की निरन्तर
उपासना करते हैं, सब प्राणियों के हित के लिए कामना करने वाले साधक सब
में समान भाव रखने वाले साधक मुझको ही प्राप्त होते हैं। भावार्थ है कि जिस
सच्चिदानन्द घन ब्रह्म अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म का ज्ञान गीता ज्ञान दाता को भी
नहीं है, उसका ज्ञान तत्वदर्शी सन्तों को होता है। तत्वदर्शी सन्त न मिलने से
ब्रह्म के ऊँ (ओम्) नाम को परम अक्षर ब्रह्म का नाम जाप मानकर साधना करते
हैं। वे तथा परमेश्वर कबीर जी ने “सोहं” मन्त्रा का आविष्कार करके साधकों को
बताया है। परन्तु सारनाम फिर भी गुप्त ही रखा है। सूक्ष्म वेद में लिखा है :-
सोहं शब्द हम जग में लाऐ। सार शब्द हम गुप्त छिपाएं।।
सोहं ऊपर और सतसुकृत एक नाम।
सब हंसों का बास है, नहीं बस्ती नहीं ठाम।।
सतगुरू सोहं नाम दे, गुझ बीरज विस्तार।
बिन सोहं सीझै नहीं, मूल मन्त्रा निज सार।।
‘‘जो साधक ’सोहं’ नाम का जाप करते हैं, यह परब्रह्म (अक्षर पुरूष जो
गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में प्रमाण है) उसका जाप है। सारनाम मिले बिना
’’सोहं’’ तथा ’’ऊँ’’ पूर्ण मोक्षदायक नहीं है। ’’ऊँ’’ का जाप ब्रह्म (गीता ज्ञान
दाता) का है। ब्रह्मलोक में महाइन्द्र का लोक प्राप्त होता है जो ब्रह्म लोक में ही
बना है तथा “सोहं” नाम के जाप की भक्ति कमाई से ब्रह्मलोक में ही बने नकली
सत्यलोक को प्राप्त होता है। साधना काल में साधक यह भी कहता रहता है ‘‘सब
प्रणियों का भला हो”
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भगवान रामपाल जी की जय हो

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