दुनिया क्या कहेगी... एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया ! पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं। तो पनिहारिन आईं तो एक ने कहा- "आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया, पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।" पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली, "उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया"। दूसरी बोली - "साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई ! अभी तक रोष भी नहीं गया, आखिर तकिया फेंक ही दिया"। तब साधु सोचने लगा - अब वह क्या करें ? तब तीसरी बोली - "बाबा ! यह तो पनघट है, यहाँ तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, और बोलती भी रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे" ? लेकिन चौथी ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी - "क्षमा करना, लेकिन हमको लगता है, तुमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं मोड़ा, चित्त तो अभी भी संसार में रमा हुआ है। दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तुम जैसे भी हो, अपना काम करते रहो। सच तो यही है, दुनिया का तो काम ही है कहना ! ! आप ऊपर देखकर चलोगे तो लोग कहेंगे की "अभिमानी हो गए...
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