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कविर्देव किसी भी मां से जन्म नहीं लेते हैं। कबीर साहेब स्वयं प्रकट होता है। इसलिए प्रकट दिवस के रूप में मनाया जाता है

सतगुरु कबीर साहिब का मगहर प्रस्थान एवम् महानिर्वाण
सतगुरु कबीर साहिब दृढ़ निश्चयी संत थे, खास कर अंध विश्वासों के मामले में तो वे बहुत ही सख्त थे। इसीलिए सभी के मना करने के बाद भी, वे मगहर जाने के लिए तैयार हो गये। संत रविदास जी, सेनजी, पीपा जी, एवं धन्ना जी आदि भी सभी थे। यात्रा में काशी के हजारों लोगों की भीड़, इस तरह से आकर शामिल हो रही थी, जैसे उनका कोई खास रखवाला काशी को हमेशा के लिए त्याग कर जा रहा है। आज वे असहाय प्रतीत हो रहे थे, क्योंकि अब उनके सुख-दुख को पूछने वाला कोई नहीं रहेगा। सभी की आँखें आँसुओं से पूर्ण थीं और हृदय व्यथित था। कबीर साहिब के यात्रा की अगुवाई नवाब बि जली खाँ और काशी नरेश वीर देव सिंह बघेल कर रहे थे। राजा वीर देव सिंह बघेल के साथ उनके सैन्यदल का विशेष दस्ता था। उस समय उमड़ा जनसैलाब को दे खकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी प्रजापालक महाराजा की विदाई की जा रही हो। चारों तरपफ गुरूदेव कबीर, सतगुरु कबीर और हमारे भगवान कबीर की आवाजें गूँ ज रही थीं। छोटे-छोटे बालकों को गोद में उठाये हुये औरतें अपने-अपने बालकों को उतार कर, कबीर साहि ब के पद चिन्हों पर अपना माथा रख कर, उनकी चरण रज को सिर पर धरण कर रही थीं। सतगुरु कबीर साहि ब के मगहर जाने की खबर सुनकर, जो जहाँ था, वह अपना काम धम छोड़कर, उनकी यात्रा में शामिल हो रहा था। नाना तरह के लोगों के मुख से नाना तरह की बा तें सुनाई दे रही थीं। कोई कह रहा था कि सम्पूर्ण का शी को प्रकाशित करने वाला चिराग, मगहर में बुझने जा रहा है। कोई कह रहा था कि परमपिता कबीर साहिब, का शी की अपनी संतानों को अनाथ करने जा रहे हैं, उनमें से कोई नवाब बिजली खाँ को कोस रहा था कि अगर वे लिवाने नहीं आते तो कबीर साहिब काशी छोड़कर नहीं जाते, कोई राजा वीर देव सिंह बघेल पर दोषारोपण कर रहे थे, कि वे काशी नरेश हैं वे कबीर साहिब को जबरदस् ती क्यों नहीं रोक लेते। साथ ही सारी जनता विह नल-विकल हो रही थी। यात्रा में लोगों का तांता इस कदर लग गया था, कि जैसे मगहर और काशी मिलकर एक हो गये हों। काशी से चलकर मगहर की सूखी आमी नदी के किनारे बसे कसरवाल गांव में पहुँच गया, कबी र साहिब ने वहीं पर अपना आसन जमाया। इस पर नवा ब बिजली खाँ पठान ने उनसे कहा कि गुरूदेव, नदी सू की पड़ी है। यहां लोगों को और आपके साथ आये संत समाज को पानी की किल्लत होगी, इसलिए आप आगे चलकर वहाँ विश्राम करें जहाँ पर मैं पानी की व् यवस्था करा सकूँ। इस बात को सुनकर कबीर साहिब ने कहा कि अब मगहर की उस ऊसर जमीन पर राम-राज का पहरा आ गया और राम-राज में कभी भी अन्न तथा पानी का अकाल नहीं रहता।  आमी नदी जो बरसों से सूखी पड़ी थी  वहां आस-पास के इलाकों से आए साधु-संतों का विशाल जमावड़ा लग गया।  अब सतगुरु कबीर सा हिब की कृपा से मगहर का क्षेत्रा श्राप मुक्त हो गया था। बारह बरस में अनवरत सूखे के बाद हुई, झमाझम बारिश से वहां की सूखी पड़ी बंजर ध्रती का कोना-को ना भीग गया था। नदी नाले और ताल तलैया सभी जल से लबालब हो गए थे। वहाँ के पशु-पक्षी और जन-समुदा य में नवप्राणों का संचार हो गया था और जीवन से हताश हुए सभी के मन में जीने की लालसा पैदा हो गई थी। तभी सतगुरु कबीर साहिब ने जिनके जीवन की शाम ढलने ही वाली थी, अपने सभी शिष्यों, भक्तों और अनुयाईयों को पास में बुलाकर, कहा अब हम अपने सारे कामों से निवृत हो चुके हैं। जो कार्य बचा था, वो यहाँ मगहर में आने से पूरा हो गया। अब हम अपने सत् लोक धम को जाएंगे। तुम सभी लोग हमारे बताए गए मार् ग का अनुसरण करना। सभी तरह के राग-द्वेष भूलकर आपस में प्रेम से मिलकर रहना, गिरे हुए को उठाना, सद्कर्म से भटके हुये को सद्मार्ग दिखाना, भूखे को भो जन और प्यासे को पानी देना। कभी किसी जीव को मत सताना। कभी भी ऐसा काम मत करना, जिससे किसी दू सरे को तकलीपफ पहुँचे। सदैव परमार्थ करना, क्यों कि परमार्थ और साधु-सेवा में ही जीवन का सार निहि त है, यह हमारा उपदेश भी है और आदेश भी। जो अपने गुरू के दिए ज्ञान और बताए गए मार्ग से भटक जाता है, अनुयायी सभी चिन्तित हो उठे। वे समझ गए थे कि सतगुरु कबीर साहिब अब सदैव के लिए उनसे दूर जाने वाले हैं। मगहर के श्राप मुक्त हो जाने की जो प्रपुफल्लता उनके मन में थी वो क्षण मा त्रा में गायब हो गई। उन सभी के खिले हुए चेहरे इस तरह मुरझा गए जिस तरह शरद )तु के तुषारपात में पुष प अपना स्वरुप और सुगंध खो देते हैं। कुछ की आँखों से तो अश्रुपात होना शुरु हो गया। तभी वहाँ कबीर सा हिब के पास काशी नरेश वीरदेव सिंह बघेल और मगहर नवाब बिजली खाँ पठान आ गए। कबीर साहिब ने अपनी खामोशी तोड़ते हुए उनसे कहा फ्राजन, अब हमा रा ये रुप अपने अनन्त स्वरुप में मिलने जा रहा है। नवाब बिजली खाँ आप हमारे लिए नई चादर की व्यवस्था करो। हम उसी चादर को ओढ़ कर चिर-विश् राम करेंगे। इस पर राजा वीरदेव सिंह बघेल और नवाब बिजली खा न ने पूफल और चादर मंगवा कर पर्णकुटी के अंदर रखवा दी और जिस वक्त कबीर साहिब अपने आसन से उठकर पर्ण कुटी के अंदर जाने लगे, उस वक्त सारा वा तावरण गमगीन हो गया था। लोगों की आँखें नम हो गई और गले रुंध गए थे। कबीर साहिब धीरे-ध ीरे चलते हुए पर्ण कुटी के अंदर चले गए तो, पलभर के लि ए चारों तरपफ सन्नाटा छा गया, जैसे कोई बहुत बड़ी अनहोनी होने वाली है। तभी काशी नरेश वीर देव सिंह बघेल ने सन्नाटे को तोड़ते हुए, श्रुतिगोपाल जी और पद् घनाभ जी आदि संतों से कहा फ्हमारे परम पूज्यगुरूदे व जी महाराज सत्लोक धम की सीढ़ियों पर कदम रख चुके हैं। इसलिए अब हमें उनके अंतिम संस्कार की तै यारी कर लेनी चाहिए तभी काट के दरवाजे के बाहर ही नरेश वीर देव सिंह वघेल के सामने खड़े नवाब बिजली खाँन ने उनसे कहा, फ्ठहरिए, काशी नरेश।। सतगुरु कबीर साहिब का अंतिम संस्कार करने के लिए पहले हमें ये तय करना होगा, कि गुरूदेव का पार्थिवशरीर किसे मिलना चाहिए। हमारी राय से उनका पार्थिव शरीर हमें मिलना चाहिए क्योंकि कबीर साहिब जुलाहे थे। उनको काशी से मगहर लाने वाले भी हम ही हैं। वे हमारे पीर भी हैं। इसलिए उनका अंतिम संस्कार भी इस् लामी धर्म की रिवायत के मुताबिक ही होना चाहिए।य नवाब की बात सुनकर नरेश वीर देव सिंह वघेल ने नारा जगी जाहिर करते हुए कहा, कि ऐसा हरगिज नहीं हो गा 'नवाब साहिब' क्योंकि सतगुरु कबीर साहिब तुम्हारे पीर होने से पहले हमारे गुरू हैं। वे मुस्लिम जुलाहे के घर में पालित जरुर हुए हैं मगर वह मुसलमान नहीं थे। इसलिए उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार हम हिन् दू धर्म की रीति रिवाज के अनुसार ही करेंगे। कबीर सा हिब के पार्थिव शरीर को प्राप्त करके, उन्हें अपने

-अपने धर्म-मजहब में जलाने और दपफनाने की बात को लेकर, राजा वीरदेव सिंह वघेल और नवाब बिजली खाँ के बीच शुरु हुआ बाद-विवाद उग्र झगड़े का रुप धरण कर लिया। दोनों तरपफ से तलवारें खिंच गई। राजा और नवाब दोनों के सैनिक अस्त्रा-शस्त्रों के साथ आमने सामने आ गए। उस भयंकर घमासान की आशंका से लोगों में भगदड़ मच गई। कुछ समय पहले बारिश की बूंदों से भीगी मगहर की ध्रती, मानव लहू से रक्त रंजित होने ही वाली थी कि पर्ण कुटी के अंदर से सतगुरु कबीर साहिब बाहर आ गए और दोनों तरपफ से तनी हुई तलवारों को देखकर अपफसोस के साथ कहा, काशी नरेश वीरदेव सिंह वघेल और नवाब बिजली खाँ तुम दोनों ने हमारी गुरु दीक्षा और उपदेशों को अका रथ कर दिया है। तुम दोनों हमारे बताए गए मार्ग से भटक गए हो। हम अपनी तमाम जिन्दगी में जिस जाति और धर्म की दीवारों को गिराते रहे, तुम लोगों ने उसी जाति-धर्म की दीवार को हमारे सामने ही खड़ा कर दिया। हमारे जीते जी हमारे पार्थिव शरीर को जलाने और दपफनाने के लिए, एक-दूसरे का खून बहाना चाहते हो, हमने जिस दीन और मजहब के झगड़े से लोगों को सदैव दूर रहने की शिक्षा दी, तुम दोनों उसी दीन और मजहब के नाम पर मर-मिटने के लिए तैयार हो। हमारी जि न्दगी को दो हिस्सों में बांट देना चाहते हो। हमारे अहिंसा के आदर्श और च(*दांतों को नपफरत के रंग में रंग देना चाहते हो। तुम दोनों के सैन्यबलों की चमकती हुई इन तलवारों ने साबित कर दिया, कि कोई भी धर्म शास्त्रों के साधु-संतों की वाणी और उपदेश, इस संसार की मान्धाता को नहीं मिटा सकते। तुम लो ग अज्ञानता के वशीभूत होकर, पहले भी जाति धर्म के नाम पर झगड़ते थे आज भी झगड़ रहे हो और आगे भी झगडते रहोगे। कबीर साहिब के इन वचनों को सुनकर, झगड़े के लिए आमदा लोगों को अपनी-अपनी गलती का एहसास हो गया। साथ ही दोनों तरपफ की सेनाओं ने अपनी तलवारें जमीन पर डाल दिया। राजा वीर देव सिं ह बघेल और नवाब बिजली खां दोनों कबीर साहिब के सामने हाथ जोड़ कर, नतमस्तक हो गए। तभी शिष्य श् रुतिगोपाल जी ने विनम्रता पूर्ण, कातरवाणी में कबीर साहिब से कहा कि फ्गुरूदेव, आप तो जा रहे हैं अब हमारा क्या होगा? हमें उंगली पकड़ कर रास्ता कौन दि खायेगा? दोबारा आपके दर्शनों की हमारी लालसा कब पूरी होगी।प्रलयकाल में उसी अखण्ड ज्योति में लय हो जाती है, हम न तो कभी जन्में है और न ही कभी मरेंगे। सतलोक से इस ध्रा धम में आए थे और अब वापस उसी सतलोक ;सचखं डद्ध में जाएंगे। लेकिन तुमसे दूर जाकर भी सदैव तुम्हा रे पास में ही रहेंगे। हमारा जो भी शिष्य भक्त हमें  मन से याद करेगा, हम उसे अवश्य दर्शन देंगे।इतना कहकर सतगुरु कबीर साहिब पलभर के लिए मौन हो गए। उनके शिष्यों और भक्तों को, जो कबीर साहिब के जीवन के आखिरी क्षणों में, उनके मुख से ज्यादा से ज्यादा उपदेश सुनना चाहते थे, उनके लिए कबीर साहिब की पल हम सैलानी सतगुरु भेजे, सैल करन कू आए जी। ना हम जन्मे ना हम मरना, शब्दै-शब्द समाये जी।। हमरे मर्यां कोई न रोवै, जो रोये पछताये जी। हंसों कारण देह ध्री हम, सो परलोक पठाये जी। कहत कबीर सुनो भाई साधो, अजर अमर घर पाये जी। सत-साहेब! सत साहिब! सत-साहिब।।। सत साहिब की इस आवाज के शांत होते ही, कुटी के अं दर एक जोर का धमाका हुआ। साथ ही एक अति देदीप यमान प्रकाश-सूरज अंदर से निकल कर, आकाश की ओर जाने लगा। जिसकी चमक से दशों दिशाएं प्रका शमय हो गईं और सभी लोगों ने देखा कि आसमान में दे व-गंधर्व और अप्सरायें आरती की थाली लिए, अपने अपने दिव्य विमानों में विराजमान, पुष्प वर्षा कर रहे हैं। साथ ही घंटा घड़ियाल और शंख ध्वनि की मधुर आवाजों से आसमान गुंजायमान हो उठा है। सतगुरु कबीर साहिब का स्वागत करने के लिए, स्वर्गलोक से दे व-गंधक और देव अप्सराएं सभी आसमान में उतर आए थे जिनके पुष्प, आभूषणों की सुगंध से सारी मगहर की ध्रती महक उठी थी और लाखों करोड़ो जीवों का उार करने सतगुरु कबीर साहिब सभी के देख
-देखते परमात्मा की परमशांति मय ज्योति में समा गए। बाद में पर्ण कुटी का दरवाजा खोला गया तो पर्ण-कुटी के अंदर, सतगुरु कबीर साहिब का पार्थिव शरीर नहीं था। उसकी जगह पूफल और चादर ही मिले, जिनको दे खकर राजा वीर देव सिंह वघेल और मगहर नवाब बि जली खान ने अपनी गलती पर बहुत पश्चाताप किया और दोनों ने मिलकर आपस में समझौता किया। उस समझौते में कबीर साहिब के पार्थिव शरीर की जगह पा ए गए पूफल राजा वीरदेव सिंह वघेल को मिले और चा दर नवाब बिजली खान को। कबीर साहिब की उसी चादर को नवाब बिजली खान ने कब्र प्रदान की और उसी जगह पर कबीर साहिब का मकबरा बनवा दिया और राजा वीरदेव सिंह ने पूफलों का दाह संस्कार करके, मकबरे के पास में ही कबीर साहिब की समाधि बनवा दी, हिन्दू मुस्लिम दो सम्प्रदाय में बंटकर, मगहर में पफूल और चादर के रूप में सिमट कर रह गई। संसार में एक मिसाल है कि किसी एक संत को दो सम्प्रदाय ने अग्नि संस्कार और दपफन किया गरीब काशी तज कर मगहर चाले, किया कबीर पियाना।

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