संत रज्जब मुसलमान थे, पठान थे।
किसी युवती के प्रेम में थे। विवाह का दिन आ गया। बारात सजी। बारात चली। रज्जब घोड़े पर सवार। मौर बाँधा हुआ सिर पर। बाराती साथ है, बैंड बाजा है इत्र का छिड़काव है, फूलों की मालाएँ है। और बीच बाजार में अपनी ससुराल के करीब पहुंचने को ही थे। दस पाँच कदम शेष रह गये थे। प्रेयसी से मिलने जा रहे था। प्रेम तो तैयार था, जरा सा रूख बदलने भर की बात थी।
यह मौका ठीक मौका है। लोहा जब गर्म हो तब चोट करनी चाहिए। एक तरह से देखो तो यह मौका एक दम ठीक था। कि अचानक घोड़े के पास एक आदमी आया उसका पहनाव बड़ा अजीब था। कोई फक्कड़ दिखाई दे रहा था। बारात के सामने आ कर खड़ा हो गया। और उसने गौर से रज्जब को देखा। आँख से आँख मिली। वे चार आंखें संयुक्त हो गयी। उस क्षण में क्रांति घटी। वह आदमी रज्जब के होने वाला गुरु थे—दादू दयाल जी। और जो कहा दादू दयाल जी ने वे शब्द बड़े अद्भुत है। उन छोटे से शब्दों में सारी क्रांति छिपी है। दादू दयाल ने भर आँख रज्जब की तरफ देखा, आँख मिली ओर
दादू जी ने कहा—
"रज्जब तैं गज्जब किया, सिर पर बांधा मौर। आया था हरी भजन कुं, करे नरक की ठौर"
बस इतनी सी बात। देर न लगी, रज्जब घोड़े से नीचे कूद पड़ा, मौर उतार कर फेंक दिया, दादू के पैर पकड़ लिए। और कहा कि चेता दिया समय पर चेता दिया.... और सदा के लिए दादू के हो गये छाया की तरह दादू दयाल के साथ रहे रज्जब, उनकी सेवा में।
फिर घर वालों ने उसके छोटे भाई की उस लड़की के साथ शादी कर दी।
काफी वर्षों के बाद रजब अपने घर की तरफ आता है तो देखता है कि उसका भाई ओर उसकी पत्नी साथ में 2, 3 बच्चे थे
रजब के भाई ने सिर पर एक टोकरा ले रखा था, एक बच्चे को गोद में उठा रखा था, पीछे उसकी पत्नी 2 बच्चों को लेकर चल रही थी !
तब रजब ने कहा -
अच्छा हुआ सतगुरु🙇♂️ मिलगे,
ना तो होते भांड👨🏼🦰।
सिर पर होता टोकरा, 🧺
पीछे होती रांड 👩🏻🦰!!
- रजब
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