‘‘श्राद्ध-पिण्डदान गीता अनुसार कैसा है?‘‘
आप श्राद्ध व पिण्डदान करते हो। गीता अध्याय 9 श्लोक 25 में स्पष्ट किया
है कि भूत पूजने वाले भूतों को प्राप्त होंगे। श्राद्ध करना, पिण्डदान करना यह भूत
पूजा है, यह व्यर्थ साधना है।
कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, क्षर पुरुष वाकि डार।
तीनों देवा शाखा हैं, पात रुप संसार।।
भावार्थ :- जमीन से बाहर जो वृक्ष का हिस्सा है, उसे तना कहते हैं। तना
तो जानों अक्षर पुरुष, तने से कई मोटी डार निकलती हैं। उनमें से एक मोटी
डार जानों क्षर पुरुष। उस डार से तीन शाखा निकलती हैं, उनको जानों तीनों
देवता (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव-शंकर जी) और इन
शाखाओं को पत्ते लगते हैं, उन पत्तों को संसार जानो।
गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में सांकेतिक विवरण है। तत्वज्ञान में विस्तार
से कहा गया है। पहले गीता ज्ञान के आधार से ही जानते हैं।
गीता अध्याय 15 श्लोक 2 में कहते हैं कि संसार रुपी वृक्ष की तीनों गुण
(रजगुण ब्रह्माजी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शंकर जी) रुपी शाखाएं है। ये
ऊपर (स्वर्ग लोक में) तथा नीचे (पाताल लोक) फैली हुई हैं।
नोट :- रजगुण ब्रह्मा, सत्गुण विष्णु तथा तमगुण शंकर हैं। देखें प्रमाण प्रश्न
नं. 7 में। तीनों शाखाएं ऊपर-नीचे फैली हैं, का तात्पर्य है कि गीता का ज्ञान पृथ्वी
लोक पर बोला जा रहा था। तीनों देवता की सत्ता तीन लोकों में है। 1. पृथ्वी
लोक, 2. स्वर्ग लोक तथा 3. पाताल लोक। ये तीन मन्त्रा हैं, एक-एक विभाग के
मन्त्रा हैं। रजगुण विभाग के श्री ब्रह्मा जी, सतगुण विभाग के श्री विष्णु जी तथा
तमगुण विभाग के श्री शिव जी।https://sadhna4.blogspot.com/
आप श्राद्ध व पिण्डदान करते हो। गीता अध्याय 9 श्लोक 25 में स्पष्ट किया
है कि भूत पूजने वाले भूतों को प्राप्त होंगे। श्राद्ध करना, पिण्डदान करना यह भूत
पूजा है, यह व्यर्थ साधना है।
कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, क्षर पुरुष वाकि डार।
तीनों देवा शाखा हैं, पात रुप संसार।।
भावार्थ :- जमीन से बाहर जो वृक्ष का हिस्सा है, उसे तना कहते हैं। तना
तो जानों अक्षर पुरुष, तने से कई मोटी डार निकलती हैं। उनमें से एक मोटी
डार जानों क्षर पुरुष। उस डार से तीन शाखा निकलती हैं, उनको जानों तीनों
देवता (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव-शंकर जी) और इन
शाखाओं को पत्ते लगते हैं, उन पत्तों को संसार जानो।
गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में सांकेतिक विवरण है। तत्वज्ञान में विस्तार
से कहा गया है। पहले गीता ज्ञान के आधार से ही जानते हैं।
गीता अध्याय 15 श्लोक 2 में कहते हैं कि संसार रुपी वृक्ष की तीनों गुण
(रजगुण ब्रह्माजी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शंकर जी) रुपी शाखाएं है। ये
ऊपर (स्वर्ग लोक में) तथा नीचे (पाताल लोक) फैली हुई हैं।
नोट :- रजगुण ब्रह्मा, सत्गुण विष्णु तथा तमगुण शंकर हैं। देखें प्रमाण प्रश्न
नं. 7 में। तीनों शाखाएं ऊपर-नीचे फैली हैं, का तात्पर्य है कि गीता का ज्ञान पृथ्वी
लोक पर बोला जा रहा था। तीनों देवता की सत्ता तीन लोकों में है। 1. पृथ्वी
लोक, 2. स्वर्ग लोक तथा 3. पाताल लोक। ये तीन मन्त्रा हैं, एक-एक विभाग के
मन्त्रा हैं। रजगुण विभाग के श्री ब्रह्मा जी, सतगुण विभाग के श्री विष्णु जी तथा
तमगुण विभाग के श्री शिव जी।https://sadhna4.blogspot.com/
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