Skip to main content

सब शास्त्रो का अनुवाद हिन्दी मे है और हिन्दी सब को आती है आज भी पडिंत हमे संस्कृत बोल कर डराते है

सतसाहेेेब
जी
‘‘प्रदूषण से मुक्ति’’
संत रामपाल जी का सख्त आदेश है कि किसी त्यौहार व खुशी के अवसर पर पटाखे नहीं छोड़ने
हैं। मोमबत्ती नहीं जलानी जो प्रदूषण के अतिरिक्त कुछ लाभ देने वाला नहीं है।
उस अवसर पर भी प्रतिदिन की तरह देशी घी की एक ज्योति जलाने की ही आज्ञा है। हम तथा
हमारे छोटे-छोटे बच्चे भी प्रभु कृपा छूटने (नाम सम्पर्क टूटने) के डर से आदेश का सख्ती से पालन करते
हैं। उस दिन हम परमात्मा की भक्ति प्रतिदिन की तरह करते हैं।
 फगुन यानि होला तथा होली के त्यौहार पर किसी प्रकार का रंग व कीचड़ व पानी एक-दूसरे
पर नहीं डालते, न कोरड़े का खेल खेलते हैं क्योंकि वर्तमान में लोग इसके बहाने दुश्मनी निकालने लगे
हैं। आपसी झगड़े होने लगे हैं। पहले सहनशील व्यक्ति होते थे। ताकतवर होते थे जो कोरड़ों की मार
सह लेते थे। वर्तमान में धक्का लगकर गिरने से युवा श्वांस भूल जाता है। इसलिए गुरू जी ने यह खेल
सख्त मना कर रखा है। उस दिन परमात्मा की स्तुति करते हैं। जिस दिन भक्त प्रहलाद की रक्षा करके
परमात्मा ने भक्तों का मनोबल बढ़ाया है। परमात्मा पर दृढ़ विश्वास हुआ है।
 दैनिक कार्य में सुविधाजनक न होने के कारण सर्व भक्तों तथा भक्तमतियों को जींस की पैंट
पहनने की मनाही है। जो हमारी संस्कृति के विरूद्ध है तथा अश्लीलता का हिस्सा है। कॉलेजों में बिना
सत्संग के परिवारों के बच्चों की सँख्या अधिक होने के कारण हमारे बच्चों को परेशानी का सामना करना
पड़ता है। फिर भी हरसंभव कोशिश करके आज्ञा पालन की जाती है। यदि सब परिवारों के बच्चों के
संस्कार ऐसे हो जाऐं तो यौवन अपराध स्वतः समाप्त हो जाऐंगे।
कबीर जी के विचारों का प्रचार करके स्वदेशी-पुरानी सभ्यता को जगाया जाता है।
कबीर, परनारी को देखिये, बहन बेटी के भाव। कह कबीर दुराचार नाश का, यही सहज उपाव।।
भावार्थ :- परमात्मा कबीर जी के विचार संत रामपाल दास जी सत्संगों में बताते हैं जिनका
मानव के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वाणी में कबीर जी ने कहा है कि दूसरे की स्त्रा तथा लड़की
को अपनी बहन-बेटी के दृष्टिकोण से देखना चाहिए जिससे मन में कभी दोष नहीं आएगा। दुराचार,
बलात्कार, व्यभिचार को समूल नष्ट करने का यह सरल उपाय है।

Comments

Popular posts from this blog

मुसीबत का सामना

जंगली भैंसों का एक झुण्ड जंगल में घूम रहा था, तभी एक बछड़े (पाड़ा) ने पुछा," पिताजी, क्या इस जंगल में ऐसी कोई चीज है जिससे डरने की ज़रुरत है ?" बस शेरों से सावधान रहना ...", भैंसा बोला "हाँ, मैंने भी सुना है कि शेर बड़े खतरनाक होते हैं . अगर कभी मुझे शेर दिखा तो मैं जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हुआ भाग जाऊँगा ..", बछड़ा बोला . "नहीं, इससे बुरा तो तुम कुछ कर ही नहीं सकते ..", भैंसा बोला बछड़े को ये बात कुछ अजीब लगी, वह बोला" क्यों ? वे खतरनाक होते हैं, मुझे मार सकते हैं तो भला मैं भाग कर अपनी जान क्यों ना बताऊं?" भैंसा समझाने लगा," अगर तुम भागोगे तो शेर तुम्हारा पीछा करेंगे, भागते समय वे तुम्हारी पीठ पर आसानी से हमला कर सकते हैं और तुम्हे नीचे गिरा सकते हैं ... और एक बार तुम गिर गए तो मौत पक्की समझो ..." तो.. तो। ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए ?", बछड़े ने घबराहट में पुछा . अगर तुम कभी भी शेर को देखो , तो अपनी जगह डट कर खड़े हो जाओ और ये दिखाओ की तुम जरा भी डरे हुए नहीं हो . अगर वो ना जाएं तो उसे अपनी तेज सींघें दिखाओ ...

कविर्देव किसी भी मां से जन्म नहीं लेते हैं। कबीर साहेब स्वयं प्रकट होता है। इसलिए प्रकट दिवस के रूप में मनाया जाता है

सतगुरु कबीर साहिब का मगहर प्रस्थान एवम् महानिर्वाण सतगुरु कबीर साहिब दृढ़ निश्चयी संत थे, खास कर अंध विश्वासों के मामले में तो वे बहुत ही सख्त थे। इसीलिए सभी के मना करने के बाद भी, वे मगहर जाने के लिए तैयार हो गये। संत रविदास जी, सेनजी, पीपा जी, एवं धन्ना जी आदि भी सभी थे। यात्रा में काशी के हजारों लोगों की भीड़, इस तरह से आकर शामिल हो रही थी, जैसे उनका कोई खास रखवाला काशी को हमेशा के लिए त्याग कर जा रहा है। आज वे असहाय प्रतीत हो रहे थे, क्योंकि अब उनके सुख-दुख को पूछने वाला कोई नहीं रहेगा। सभी की आँखें आँसुओं से पूर्ण थीं और हृदय व्यथित था। कबीर साहिब के यात्रा की अगुवाई नवाब बि जली खाँ और काशी नरेश वीर देव सिंह बघेल कर रहे थे। राजा वीर देव सिंह बघेल के साथ उनके सैन्यदल का विशेष दस्ता था। उस समय उमड़ा जनसैलाब को दे खकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी प्रजापालक महाराजा की विदाई की जा रही हो। चारों तरपफ गुरूदेव कबीर, सतगुरु कबीर और हमारे भगवान कबीर की आवाजें गूँ ज रही थीं। छोटे-छोटे बालकों को गोद में उठाये हुये औरतें अपने-अपने बालकों को उतार कर, कबीर साहि ब के पद चिन्हों पर अपना माथ...

राजा की कथा

_एक बार समय निकालकर अवश्य पढ़े..._        ☂️बोध कथा☂️      ⭕   परिवर्तन  ⭕ ~~~~~~~~~~~~~ ♦ एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था । बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया । उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया । ♦ राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें । सारी रात नृत्य चलता रहा । ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी । नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा -  बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।_ एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय।"_ ♦ अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला । तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा।  ♦ जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो  उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं ।  ♦ वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़...