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घरेलू हिंसा : चुपचुप रहना कब तक सहना
यूं तो आपस में इसका कोई ताल मेल नहीं पर फिर भी ये अपराध घरों के अन्दर पनप रहा है। घरेलू हिंसा का रूप बन रहा है। ये एक ऐसा अपराध है जो अपनों द्वारा किया जाता है और इसको सहने पर मजबूर हैं महिलाएं। शादी के बाद पति द्वारा व ससुराल पक्ष से एक महिला को यातनाएं सहने पर मजबूर होना पड़ता है। पिता की लाडो एक बड़े अरमानों से डोली में बैठ कर दूसरे घर जाती हैं पर वो ही घर उसके पूरे जीवन व उसके वजूद का अखाड़ा बन जाता है। अपने ही घर की चार दीवारी में अपने ही पति के हाथों पिटती एक औरत प्रमाण है हमारे समाज के पुरूषों की मनोदशा का पुरूषों ने अपनी कमजोरी को और अपने झूठे पुरूषत्व का वर्चस्व कायम रखने के लिए मर्दानगी का मुखौटा पहन रखा है।
शर्मिन्दगी के साथ कहना पड़ रहा है कि ये स्थिति केवल निम्न वर्ग की नही हमारे शिक्षित समाज की है। बात 21वीं सदी है जहाँ महिलाओं की स्वतन्त्रता का जोर-शोर से डंका पीट जा रहा है वहीं इस शिक्षित समाज में महिलाए पित्रसत्तात्मक समाज की चक्की में पिसती नजर आ रही है। हर दस में एक घरेलू हिंसा का शिकार है। एक संगठन द्वारा कराए गए सर्वेक्षण से घरेलू हिंसा की यह स्थिति समाने आई है कि लगभग 5 करोड़ महिलाएं इसका शिकार है लेकिन केवल 0.1 प्रतिशत ने ही इसके खिलाफ शिकायत दर्ज करायी है।
आंकड़े बताते है कि 15 से 40 वर्ष की उम्र की महिलाएं इनका शिकार बनती है। प्रश्न यह है कि पुरूष अपनी पत्नी को पीट कर ही सन्तुष्ट क्यों होता है। छोटी-2 बातों पर पत्नी पर हाथ उठाना अपशब्दों से उसे अपमानित करना यह घरेलू हिंसा शारीरिक न होकर मानसिक व आर्थिक, भावनात्मक हिंसा के रूप में सामने आती है। समाज में घरेलू हिंसा को लोग घरेलू मामला समझ कर दर किनार कर देते है इसे पती पत्नी का आपसी मामला कह कर सब पीछे हट जाते हैं।
वर्षों से महिलाओं के स्वाभिमान और उनके जीवन की आहुति दी जा रही है। आज एक शिक्षित स्त्री भी अपने साथ हो रहे र्दुव्यहार के खिलाफ नहीं बोलती क्योंकि कही न कहीं उसे इस बात का डर आज भी है कि पुरूष प्रधान समाज में उसकी व्यथा सुनने वाला कोई नहीं उसकी आवाज घर में ही दबा दी जाएगी इस लिए वह इसे अपनी नियति मानकर चुप्पी साधे सहती जाती है और जिन्दा लाश बन कर जीती रहती है।
हमारे देश में तो जैसे पुरूषों को शादी के बाद पत्नी पर हाथ उठाने का अधिकार मिल जाता है। किसने दिया ये उन्हें? किस कानून में लिखा है कि शादी के बाद एक लड़की ताउम्र उसके इशारों की कठपुतली हो गयी है। ऐसा समझना पुरूषों की नामर्दिगी की निशानी है और उनकी सबसे बड़ी भूल है। हमारी सबसे बड़ी विवशता यह है कि हमारे समाज में घरेलू हिंसा को कानूनी अपराध न मान कर उसे घरेलू मसला कह कर घर में ही दबा दिया जाता है और यदि कोई महिला इसके लिए आवाज उठाती है तो उसे उसके बाद अपने घर वाले से समाज से कानून से कई तरह की शारीरिक मानसिक और आर्थिक यातनाओं का सामना करना पड़ता है।
इसको लेकर भारत में मुख्य रूप से 2 कानून हैं, जो महिलाओं की घरेलू हिंसा से रक्षा करते हैं: इंडियन पीनल कोड की धारा 498ए, 1983 में भारतीय संसद द्वारा पारित किए गए इस कानून के अंतर्गत, जो भी व्यक्ति चाहे वह महिला का पति हो या पति का रिश्तेदार, महिला के साथ क्रूर व्यवहार करता है, तो उसे 3 साल तक की कैद और जुर्माने की सजा मिल सकती है। इस के अंतर्गत क्रूरता के आधार पर महिला को पति से तलाक भी मिल सकता है। दूसरा – द प्रोटैक्शन आॅफ वूमन फ्राम डोमैस्टिक वायलैंस ऐक्ट 2005: इसे 26 अक्तूबर, 2006 से लागू किया गया है। वैसे तो यह महिलाओं के हित में बनाया गया है, पर कोई और भी शख्स यदि डोमैस्टिक वायलैंस से पीड़ित है तो इस कानून के तहत शिकायत कर सकता है।
महिला के साथ घर में रहने वाले किसी सदस्य द्वारा भलाबुरा कहना, क्रूर व्यवहार करना, सताना, गालियां देना, मारना पीटना, बेइज्जती करना या फिर यौन संबंध हेतु जबरदस्ती करना आदि अपराध इस कानून के अंतर्गत आते हैं। इस तरह के मामलों में महिला पुलिस में शिकायत कर सकती है। उसे कई तरह से राहत दी जाएगी जैसे धारा 17 के तहत घर में रहने की इजाजत, धारा 18 के तहत प्रोटैक्शन और्डर, धारा 20 के तहत आर्थिक राहत, धारा 21 के तहत कस्टडी आॅर्डर और धारा 22 के तहत हर्जाना।
यदि घरेलू हिंसा से भारत की लड़कियों को बचाना है, तो जरूरी है कि घर में बच्चों को शुरू से ही सही संस्कार दिए जाएं। उन्हें बताया जाए कि लड़के लड़की में कोई फर्क नहीं और ऐसा कतई नहीं है कि भाई अपनी बहनों के साथ मारपीट करें या उन्हें दबा कर रखें। जब तक वे बचपन से महिलाओं का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, आगे चल कर भी बीवी पर हाथ उठाने की उन की आदत नहीं जाएगी। लड़कों को बचपन से जो यह सिखाया जाता है कि लड़के रोते नहीं, उस की जगह यह सिखाया जाए कि लड़के रुलाते नहीं।
2. point
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