मानव को धर्म के नाम पर बहुत भ्रमित किया गया है। हर व्यक्ति के कार्यों को उसका धर्म कह कर गुमराह किया जाता रहा है। सांसारिक कार्यों को कर्तव्य कहा जाना चाहिए। जैसे विधार्थी का कर्तव्य है कि वो विधाध्ययन करे सैनिक का कर्तव्य है कि वह देश की रक्षा करे किसान का कर्तव्य है कि वह संसार के लिये अन्न उत्पादन करे यह सब कर्तव्यों को हमने धर्म का नाम देकर धर्म की मूल परिभाषा को भूला दिया है धर्म परमात्मा प्राप्ति के लिये किये गये कार्यो को कहते है जिन्हे यज्ञ भी कहा गया है। जैसे गुरु को दान, गुरुआदेश से ध्यान, गुरु से कबीर परमात्मा का सतज्ञान गुरु को प्रणाम ,ज्योति हवन और सेवा आदि
ये सब मानव के मूल कर्तव्य है इन्ही मूल कर्तव्यों को धार्मिक कार्य कहा जाता है।
सांसारिक कार्य अनिवार्य है परन्तु वो मुख्य नही है वे गौण कर्म है गौण कर्मो का स्वरूप बदल सकता है जैसे एक विधार्थी सैनिक हो सकता है एक सैनिक किसान हो सकता है लेकिन मुख्य कर्म या धार्मिक कर्म कभी नही बदलते ये सबके समान होते है और आजीवन अनवरत करते रहने पडते है।
फल दोनो ही कर्मो से प्राप्त होते है सांसारिक कार्यो के करने से जो फल मिलता है वो सीमित ही होता है धार्मिक कार्यो से मिलने वाला फल असीमित होता है।
कार्य किये बिना हम नही रह सकते समस्त सृष्टि कर्म के चक्र मे फंसी है यदि शारीरिक
क कर्म नही करोगे तो मानसिक होता रहेगा और मानसिकता आपको शारीरिक कर्म करने के लिये विवश कर देगी कर्म ना करे यह इन्सान के वश मे नही है क्या और कैसे कर्म करे इसके लिये कुछ हद तक स्वतंत्रता है। जैसे जैसे धार्मिक कर्म अनवरत करते रहते है यह कार्य करने की स्वतंत्रता बढती रहती है और एक दिन जीव स्वतंत्र होकर मोक्ष प्राप्ति कर लेता है।
भगवान रामपाल जी महाराज की जय हो जय हो जय हो

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