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हो। यह सब वचन अर्जुन विशेष भयभीत हो कर कह रहा है। अध्याय 11 के श्लोक 45 में अर्जुन
कह रहा है कि पहले न देखे हुए आपके इस विराट (काल) रूप को देख कर मैं (अर्जुन) हर्षित हो
रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है। आप उस देव रूप को मुझे दिखाईये। हे
देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होईए। अध्याय 11 के श्लोक 46 में अर्जुन कह रहा है कि मैं वैसे ही
आपको मुकुट धारण किए हुए, गदा चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। हे विश्वरूप!
सहस्राबाहो (हजार भुजा वाले) उसी चतुर्भुज रूप में प्रकट होईए।
इससे यह भी सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता हजार भुजाओं वाला काल ब्रह्म है। श्री कृष्ण तो
श्री विष्णु जी थे जिनकी चार भुजा हैं। चार भुजा वाला दो भुजा बना सकता है, परंतु हजार नहीं
अध्याय 11 के श्लोक 32.46 का सारांश :-
अध्याय 11 के श्लोक 32 में काल भगवान कह रहा है कि मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा
हुआ काल हूँ। इस समय लोकों को नष्ट करने के लिए आया (प्रकट हुआ) हूँ। जो प्रतिपक्षियों की
सेना में स्थित योद्धा लोग हैं वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात् मैं खा जाऊँगा। अध्याय 11
के श्लोक 33ए34 में कहा है कि अतःएव तू उठ, यश प्राप्त कर, शत्राओं को जीत कर धन-धान्य से
सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब पहले ही मेरे द्वारा मारे हुए हैं। अर्जुन (सव्यसाचिन - बाँए हाथ से भी
बाण चलाने का अभ्यास होने से ‘‘सव्यसाची‘‘ नाम अर्जुन का पड़ा) तू केवल निमित्त मात्रा बन जा।
तू वैरियों को जीतेगा। युद्ध कर। अध्याय 11 के श्लोक 35 में संजय ने कहा कांपता हुआ अर्जुन
भयभीत हो कर प्रणाम करता हुआ भगवान कृष्ण (क्योंकि अर्जुन मान रहा था यह कृष्ण है परंतु वह
तो काल था) के प्रति गद्-गद् वाणी बोला अध्याय 11 श्लोक 36 में - हे अन्तर्यामी! भयभीत
राक्षस दिशाओं में भाग रहे हैं। सिद्धगणों का समूह नमस्कार कर रहा है। अध्याय 11 के श्लोक
37,38 में अर्जुन कह रहा है कि हे ब्रह्मा के भी आदिकर्त्ता महान आत्मा! आपको क्यां न नमस्कार
करें? हे जगन्निवास! आप सत्-असत् उनसे भी परे अक्षर वह आप हैं। (डरता अर्जुन काल को
सर्वस्व कह रहा है) अध्याय 11 के श्लोक 39 में अर्जुन कह रहा है कि आप ही ब्रह्मा के पिता हैं
(अर्थात् काल ही ब्रह्मा का पिता हैं) आपको बार-2 नमस्कार हो। अध्याय 11 के श्लोक 40 से 44
तक में अर्जुन कह रहा है कि मेरे से भूल हो गई कि मैंने आपको सीधा नाम से हे कृष्ण, हे यादव, हे
सखे (साथी) अर्थात् साला इस प्रकार हठात् कहा तथा आम साथियों के सामने ऐसा कह कर
अपमानित किया। मैं क्षमा चाहता हूँ। आप सबसे बड़े गुरु हैं। आपसे बड़ा कोई नहीं है।
मैं आप श्वर को प्रणाम तथा प्रार्थना करता हूँ। आप क्षमा करो। आप हमारे सर्व अपराध सहन करने वालेहो। यह सब वचन अर्जुन विशेष भयभीत हो कर कह रहा है। अध्याय 11 के श्लोक 45 में अर्जुन
कह रहा है कि पहले न देखे हुए आपके इस विराट (काल) रूप को देख कर मैं (अर्जुन) हर्षित हो
रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है। आप उस देव रूप को मुझे दिखाईये। हे
देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होईए। अध्याय 11 के श्लोक 46 में अर्जुन कह रहा है कि मैं वैसे ही
आपको मुकुट धारण किए हुए, गदा चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। हे विश्वरूप!
सहस्राबाहो (हजार भुजा वाले) उसी चतुर्भुज रूप में प्रकट होईए।
इससे यह भी सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता हजार भुजाओं वाला काल ब्रह्म है। श्री कृष्ण तो
श्री विष्णु जी थे जिनकी चार भुजा हैं। चार भुजा वाला दो भुजा बना सकता है, परंतु हजार नहीं
बना सकता। हजार भुजा वाला भगवान चार भुजा, दो भुजा बना सकता है https://youtu.be/XmGiKY3iOjc


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