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‘‘मक्का महादेव का मंदिर है‘‘ प्रमाणित 👍👊

                      ‘‘मक्का महादेव का मंदिर है‘‘

भाई बाले वाली जन्म साखी में प्रमाण है :-
‘‘साखी मदीने की चली‘‘ हिन्दी वाली के पृष्ठ 262 पर श्री नानक जी ने चार
इमामों के प्रश्न का जवाब देते हुए कहा है :-
आखे नानक शाह सच्च, सुण हो चार इमाम।
मक्का है महादेव का, ब्राह्मण सन सुलतान।।
अब आप जी को अपने उद्देश्य की ओर ले चलता हूँ। आप जी को स्पष्ट
करना चाहता हूँ कि जो यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान सूक्ष्म वेद, गीता तथा चारों वेदों
में है, वह न तो पुराणों में है, न कुआर्न् शरीफ में, न बाईबल में, न छः शास्त्रों
तथा न ग्यारह उपनिषदों में। उदाहरण :- जैसे दसवीं कक्षा तक का पाठ्यक्रम
गलत नहीं है, परंतु उसमें ठण्।ण् तथा डण्। वाला ज्ञान नहीं है। वह पाठ्यक्रम गलत
नहीं है, परन्तु पर्याप्त नहीं है। समझने के लिए इतना ही पर्याप्त है।
अन्य उदाहरण :- गीता अध्याय 2 श्लोक 46 में कहा है कि अर्जुन! बड़े
जलाशय (झील) की प्राप्ति के पश्चात् छोटे जलाशय (तालाब, जोहड़) में
जितनी आस्था रह जाती है, उसी प्रकार पूर्ण परमात्मा का सम्पूर्ण ज्ञान होने के
पश्चात् अन्य ज्ञान तथा भगवानों में वैसी ही आस्था रह जाती है।
जिस समय गीता ज्ञान कहा गया था, उस समय सर्व मानव जलाशयों के
आसपास बसते थे, वर्षा होती थी, तालाब भर जाते थे। पूरे वर्ष उसी जलाशय 
े मानव स्वयं पानी पीते थे, पशुओं को उसी से पिलाते थे। उसके दो भाग कर
लिए जाते थे। यदि एक वर्ष वर्षा न होती तो छोटे जलाशयों पर आश्रित व्यक्तियों
को संकट हो जाता था, त्राहि-त्राहि मच जाती थी।
झील बहुत बड़ा गहरा जलाशय होता है जिसका पानी 10 वर्ष वर्षा न हो तो
भी समाप्त नहीं होता। यदि किसी व्यक्ति को झील वाला जलाशय मिल जाए तो
वह तुरंत छोटे जलाशय को छोड़कर उस झील के किनारे बसेरा कर लेता था।
इसी प्रकार आप जी को इस पवित्रा पुस्तक ’’गीता तेरा ज्ञान अमृत’’ में वह झील
वाला जलाशय प्राप्त है। अतिशीघ्र इसके किनारे आकर बसेरा करें और अपना
मानव जीवन सुखी करें। कृपा पीऐं इस ज्ञान अमृत को और अमर हो जाऐं।
हिन्दू कहते हैं कि मुसलमान सर्व विपरीत साधना करते हैं। हम उदय होते
सूर्य को प्रणाम करते हैं, मुसलमान अस्त होते सूर्य को सलाम करते हैं।
विवेचन :- दोनों का आशय सही है, परन्तु विवेक की कमी है। हिन्दू उदय
होते सूर्य को धन्यवाद करते हैं कि हे प्रकाश के देवता! आपका धन्यवाद करते हैं,
आप ने काली रात के पश्चात् उजाला दिया जिससे हम अपना निर्वाह कार्य कर
सकेंगे। आप ऐसे ही हम पर कृपा बनाए रखना।
मुसलमान जानते हैं कि सुबह तो सूर्यदेव का धन्यवाद हमारे बड़े भाईयों
हिन्दुओं ने हम सबकी मंगल कामना करते हुए कर दिया। सूर्य अस्त होते समय
हम सूर्य का धन्यवाद कर देते हैं कि हे प्रकाश करने वाले सूर्य! आपने हम सर्व
जीवों को प्रकाश प्रदान करके हम पर बड़ा उपकार किया। हम आपका धन्यवाद
करते हैं। आप कल फिर इसी प्रकार कृपा करना, आप भी अल्लाह अकबीर की
रचना हो और हम भी उसी की सन्तान हैं।
वास्तव में न तो मुसलमान सूर्य की पूजा करते हैं, न हिन्दू। दोनों पक्ष
पूर्व-पश्चिम की ओर मुख करके सुबह हिन्दू तथा शाम को मुसलमान परमात्मा की
भी पूजा करते हैं।
पूजा केवल पूर्ण परमात्मा की करनी चाहिए। अन्य देवों, फरिश्तों का आदर
करना चाहिए। अधिक ज्ञान के लिए आगे पढ़ें ’’गीता का सत्य सार’’ इसी पुस्तक में।
निवेदन :- इसी पुस्तक के अंत में पृष्ठ 204 पर गीता प्रैस गोरखपुर से
प्रकाशित श्री जयदयाल गोयन्दका जी द्वारा अनुवादित गीता के संबंधित अध्यायों
के श्लोकों की फोटोकॉपी लगाई है ताकि आप जी सत्य को तुरंत जान सकें और
आप जी को प्रमाण देखने के लिए अन्य गीता खरीदने की आवश्यकता न पड़े।
लेखक
 संत रामपाल दास

Comments

Shalu said…
बहुत बढ़िया पोस्ट और बिल्कुल सत्य घटना है।☑️
ये तो हमारे सदग्रंथों में भी बताया गया है कि पूर्ण परमात्मा की भक्ति करने से हमारे सभी पापों का निवारण हो सकता है।

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