वशंवाद की राजनीति मे उलझा रहा आज तक विकास।
भारत की राजनीति किस प्रकार वंशानुगत हमारा शोषण कर रही है। जिस राजनीति की बात करते करते हम अपना सारा जीवन नष्ट कर लेते है वो कुछ परिवारो के यंहा गिरवी पडी है।
यदि हम उतर से दक्षिण भारत की ओर चले तो सबसे पहले कश्मीर जिसमे दो पार्टियां National Conference, और People democratic party दोनो वंशानुगत है दोनो के अध्यक्ष उनके वंशज ही है।
पंजाब मे अकाली दल पूर्णतया वशंवादी है हरियाणा मे तीन लाल की चौथी पीढी शासन तक पहुच चुकी है हिमाचल और राजस्थान कुछ ऐसे राज्य है जिनमे मुख्य दल काग्रेंस और भाजपा है। जिनके वशंवाद के बारे मे सब परिचित है।
उतरप्रदेश मे बहुजन समाज पार्टी मे काशीराम के बाद मायावती और मायावती के बाद इसका भतीजा। समाजवादी पार्टी परिवारवाद का सबसे बड़ा उदाहरण रहा है एक समय मे सबसे ज्यादा विधायक इसी दल के रह चूके है।
लालू की पार्टी मे उसके लडको कि अध्यक्ष होना यही दर्शाता है।
पश्चिम बंगाल में ममता का ममत्व उसके परिवार के प्रति होना है।
उडीसा बीजू जनता दल परिवारिक दल है।
आन्ध्रप्रदेश मे तेलगूदेशम पार्टी ससुर जवांई के द्वारा संचालित रही है।
शिवसेनाप्रमुख बालठाकरे बहुत देशभक्ति की बाते करनेवाले भी अततः पुत्रमोह मे मोहित हुये
तमिलनाडु मे करुणानिधि और जयललिता दोनो परिवार ही शासित रहे है।
भाजपा को परिवारवाद से बाहर नही समझना चाहिए वो चाहे प्रमोद महाजन की बात हो या गोपीनाथ मूंडें की राजनाथ की बात हो या यशवंत सिन्हा की कुछ बेऔलाद नेताओं को पदाधिकारी बनाने के बाद भी भाजपा वंशवाद से अछूती नही है वशंवाद की कुछ कमी भाजपा के ब्राह्मणवाद ने पूरी कर दी।
काग्रेस की बात करने की आवश्यकता ही नही होनी चाहिए उससे सब परिचित है काग्रेसियो की हार का कारण ही वंशवादी होना है।

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