Skip to main content

बधाई एक पाखण्ड

 नया साल नया दिन बधाइयां एक पाखंड

हर उस काम को जिसका दिखावा बहुत हो और उसके करने से लाभ की अपेक्षा नुकसान हो उसे पाखंड कहते है। नया साल पढे लिखे लोगो द्वारा किया जाने वाला महा पांखड है। ये जो अक्षर ज्ञान युक्त भाई बहन है इन्हे स्वयं का आत्म निरीक्षण करने का समय ही नही मिलता ये लोग हमेशा दुसरो की ही समीक्षा करते रहते हैआज हम इनसे इस नये साल के पाखंड के बारे मे जानना चाहेगे।

दरअसल कुछ लोग इस ओर ध्यान ना देकर एक प्रवाह मे बहते हुये इसका अनुसरण करते रहते है। यह जिम्मेदारी के साथ निभाया जाने वाला एक पाखंड है यदि आप गलती से किसी को आज शुभकामनाएं नही दे पाये तो वह आपसे नाराज भी हो सकता है।

 इन्ही फालतू बातो की वजह से ही हम whatsapp नाम की सुविधा प्रयोग नही कर पाते क्योंकि सारा दिन प्रातःकाल से रात्रि तक यही पाखंड पोषित होता रहता है। 
जब तक good morning का पाखंड खत्म होगा तब तक good night का ढोग शुरु हो जायेगा और आज तो नये साल की शुभकामनाओ का तांता लगा है। अरे भाईयो जी लेने दो यारो।

हमारी प्रातः सांय हमारे कर्माधार पर सुखी दुखी होती है और हमारे कर्म भगवान ने ठीक करवा दिये है जो बुराई बची है उसके लिये भी भगवान रामपाल जी हमारे सरपरस्त है जल्दी ही ठीक करवा देगे पर आपका क्या करे कल शाम का आपका Hang Over खत्म नही हुआ और आपकी शुभ कामना सन्देश आ गया। कल आपने जिन मुर्गो का मांस खाया था उनकी जीवन लीला समाप्त करके आप हमारी लम्बी उम्र की कामना कदापि ना करे।

 हम इन झूठी देशभक्ति और झूठी मानव कल्याण के ढोंग से तंग आ चुके है अगर दम है तो कुछ practical किजिये अन्यथा जो करना चाहते है उन्हे करने दे। भारतीय संस्कृति के महीनो के नाम भी जो नही जानते आज वो हमें भारतीय संस्कृति का हवाला देकर भावुक करने की कोशिश ना करे।

 मांसाहारी व्यक्ति कभी भी मानवता की बात ना करे। मानवता की बाते करने से पहले मानव और दानव का भेद समझिये कर्म दानव के और दिखावा मानव का हमारे साथ बिल्कुल नही चलेगा हम ऐसे दोगले लोगो को बुरी संगत मानते है अतः बुरी संगत से हम अकेले ही भले है🙏🙏🙏🙏🙏

जय हो जय हो भगवान रामपाल जी की जय हो।

Comments

Popular posts from this blog

मुसीबत का सामना

जंगली भैंसों का एक झुण्ड जंगल में घूम रहा था, तभी एक बछड़े (पाड़ा) ने पुछा," पिताजी, क्या इस जंगल में ऐसी कोई चीज है जिससे डरने की ज़रुरत है ?" बस शेरों से सावधान रहना ...", भैंसा बोला "हाँ, मैंने भी सुना है कि शेर बड़े खतरनाक होते हैं . अगर कभी मुझे शेर दिखा तो मैं जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हुआ भाग जाऊँगा ..", बछड़ा बोला . "नहीं, इससे बुरा तो तुम कुछ कर ही नहीं सकते ..", भैंसा बोला बछड़े को ये बात कुछ अजीब लगी, वह बोला" क्यों ? वे खतरनाक होते हैं, मुझे मार सकते हैं तो भला मैं भाग कर अपनी जान क्यों ना बताऊं?" भैंसा समझाने लगा," अगर तुम भागोगे तो शेर तुम्हारा पीछा करेंगे, भागते समय वे तुम्हारी पीठ पर आसानी से हमला कर सकते हैं और तुम्हे नीचे गिरा सकते हैं ... और एक बार तुम गिर गए तो मौत पक्की समझो ..." तो.. तो। ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए ?", बछड़े ने घबराहट में पुछा . अगर तुम कभी भी शेर को देखो , तो अपनी जगह डट कर खड़े हो जाओ और ये दिखाओ की तुम जरा भी डरे हुए नहीं हो . अगर वो ना जाएं तो उसे अपनी तेज सींघें दिखाओ ...

कविर्देव किसी भी मां से जन्म नहीं लेते हैं। कबीर साहेब स्वयं प्रकट होता है। इसलिए प्रकट दिवस के रूप में मनाया जाता है

सतगुरु कबीर साहिब का मगहर प्रस्थान एवम् महानिर्वाण सतगुरु कबीर साहिब दृढ़ निश्चयी संत थे, खास कर अंध विश्वासों के मामले में तो वे बहुत ही सख्त थे। इसीलिए सभी के मना करने के बाद भी, वे मगहर जाने के लिए तैयार हो गये। संत रविदास जी, सेनजी, पीपा जी, एवं धन्ना जी आदि भी सभी थे। यात्रा में काशी के हजारों लोगों की भीड़, इस तरह से आकर शामिल हो रही थी, जैसे उनका कोई खास रखवाला काशी को हमेशा के लिए त्याग कर जा रहा है। आज वे असहाय प्रतीत हो रहे थे, क्योंकि अब उनके सुख-दुख को पूछने वाला कोई नहीं रहेगा। सभी की आँखें आँसुओं से पूर्ण थीं और हृदय व्यथित था। कबीर साहिब के यात्रा की अगुवाई नवाब बि जली खाँ और काशी नरेश वीर देव सिंह बघेल कर रहे थे। राजा वीर देव सिंह बघेल के साथ उनके सैन्यदल का विशेष दस्ता था। उस समय उमड़ा जनसैलाब को दे खकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी प्रजापालक महाराजा की विदाई की जा रही हो। चारों तरपफ गुरूदेव कबीर, सतगुरु कबीर और हमारे भगवान कबीर की आवाजें गूँ ज रही थीं। छोटे-छोटे बालकों को गोद में उठाये हुये औरतें अपने-अपने बालकों को उतार कर, कबीर साहि ब के पद चिन्हों पर अपना माथ...

राजा की कथा

_एक बार समय निकालकर अवश्य पढ़े..._        ☂️बोध कथा☂️      ⭕   परिवर्तन  ⭕ ~~~~~~~~~~~~~ ♦ एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था । बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया । उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया । ♦ राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें । सारी रात नृत्य चलता रहा । ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी । नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा -  बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।_ एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय।"_ ♦ अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला । तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा।  ♦ जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो  उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं ।  ♦ वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़...